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कैसे बदलेगी यह दुनिया

उनकी गिनती दुनिया के सबसे अमीर लोगों में होती है। वह सॉफ्टवेयर, खासकर ऑपरेटिंग सिस्टम की दुनिया के बादशाह कहे जाते हैं। लेकिन माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स सिर्फ व्यवसायी नहीं हैं। दुनिया में बदलाव लाने की सोच के कारण भी उनकी काफी इज्जत होती है। पेश है बिल गेट्स का एक ऐसा भाषण, जिसमें उन्होंने दुनिया बदलने के अपने सपने की चर्चा की है:

मैं आपके साथ कुछ समस्याओं पर चर्चा करना चाहता हूं। अगर हम समाज की चिंता करने वाले स्मार्ट लोगों की मदद से इन समस्याओं पर काम करें, तो यकीनन हम सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। आज मैं दो समस्याओं की चर्चा करना चाहता हूं। यहां यह बता दूं कि मैं एक आशावादी इंसान हूं। मेरी राय में समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, इसका हल खोजा जा सकता है। 

बेहतर इलाज का युग
पिछली सदी में इंसान की औसत आयु लगभग दोगुनी हुई है। दूसरे आंकड़े बाल मृत्यु दर के बारे में हैं, जो बताते हैं कि दुनिया में बच्चों की मौत में कमी आई है। जाहिर है, यह बड़ी बात है। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि लोगों की आय बढ़ी है, बल्कि इसकी वजह यह है कि आज हमारे पास बीमारियों से बचाव व इलाज की बेहतर दवाएं और टीके उपलब्ध हैं। मसलन, 1990 में चेचक की वजह से 40 लाख मौतें हुई थीं, जबकि अब यह घटकर चार लाख हो गया है। अब हमारे सामने कुछ और बीमारियां हैं, जैसे डायरिया, निमोनिया और मलेरिया, जो मौत की वजह बनती हैं। हमें इन पर काम करना होगा।

मलेरिया से लड़ना होगा
कैसे रुकेगी मलेरिया बीमारी? सन 1900 के पहले तक लोगों को इसकी वजह पता नहीं थी। इसके बाद ब्रिटेन के सैनिक डॉक्टर ने पता लगाया कि मलेरिया की वजह मच्छर है। इसे रोकने के दो उपाय खोजे गए। पहला डीडीटी से मच्छरों का मारना और दूसरा मरीजों का कुनैन से इलाज करना है। इससे मलेरिया रोग को हराने में मदद मिली। पर यह सफलता सिर्फ अमीर देशों को मिली। 1970 तक अमेरिका व यूरोप के ज्यादातर हिस्सों को मलेरिया से मुक्ति मिली, जबकि 1990 तक उत्तरी क्षेत्र इससे आजाद हुए। बाकी जगह इसका प्रकोप कायम है।

मलेरिया से ज्यादा गंजेपन पर खर्च
दुखद यह है कि इस बीमारी का ज्यादा प्रकोप गरीब देशों में है, इसलिए इस रोग से जंग में ज्यादा निवेश नहीं किया जाता। आखिर मलेरिया के मुकाबले गंजेपन की बीमारी पर ज्यादा धन क्यों खर्च किया जाता है? गंजापन! वाकई यह भयानक है। आप जानते हैं कि गंजापन अमीरों को होने वाली बीमारी है। शायद इसलिए गंजेपन को ज्यादा वरीयता दी जाती है। हर साल मलेरिया से होने वाली लाखों मौतों के बावजूद इसके उन्मूलन को कम तवज्जो दी जाती है। 

लोगों को जागरूक करना होगा
मलेरिया से लड़ाई में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जब हम इससे लड़ने के उपाय खोजते हैं, तो कुछ समय के लिए वे कारगर होते हैं और मृत्यु दर में कमी आ जाती है, लेकिन कुछ समय बाद ये उपाय मलेरिया के मच्छर पर निष्प्रभावी हो जाते हैं और बीमारी का प्रकोप पहले की तरह भयानक हो जाता है। हमारा फाउंडेशन मलेरिया के नए टीकाकरण के लिए धन मुहैया करा रहा है। टीका सफल रहा, तो हम लाखों जिंदगियां बचा पाएंगे। लेकिन सिर्फ टीका ही पर्याप्त नहीं है। हमें लोगों को जागरूक भी करना होगा। इसके लिए हम समाज वैज्ञानिकों की मदद ले सकते हैं। मलेरिया से छुटकारा पाने के लिए हमें दवा कंपनियों की मदद चाहिए। अमीर देशों की सरकारों को इसमें मदद करनी होगी। 

अच्छे शिक्षकों की जरूरत
अब मैं दूसरा मुद्दा उठाता हूं। यह मुद्दा मलेरिया से बिल्कुल अलग है। पर यह अहम मसला है। हमें अच्छे टीचर तैयार करने होंगे। हम सबने अच्छी शिक्षा पाई है। हमारे टीचर बहुत अच्छे थे। हमारी सफलता के पीछे उनका हाथ है। हालांकि मैं कॉलेज ड्रॉपआउट रहा हूं, लेकिन मैं कह सकता हूं कि मेरे टीचर बहुत महान थे। अमेरिका में टीचिंग व्यवस्था काफी अच्छी है। यहां टॉप 20 फीसदी बच्चों को अच्छे टीचर मिले हैं। ये वे छात्र हैं, जिन्होंने सॉफ्टवेयर और बायो-टेक्नोलॉजी में बेहतरीन काम किया। अब इन 20 फीसदी छात्रों का प्रभाव कम होने लगा है। आप अर्थव्यवस्था पर नजर डालें, तो पाएंगे कि यह सिर्फ उन लोगों को तरक्की के अवसर प्रदान करती है, जिन्होंने बेहतर शिक्षा हासिल की। हमें इस व्यवस्था को बदला होगा। 

शिक्षकों को प्रोत्साहन
मेरे फाउंडेशन ने पिछले नौ साल में इस क्षेत्र में निवेश किया है। हमने छोटे स्कूलों में काम किया, स्कॉलरशिप दीं और हमने पुस्तकालयों के लिए धन दिया। इनके अच्छे नतीजे आए। लेकिन इन सबके बावजूद हमने लगातार यह महसूस किया कि बेहतर शिक्षक होना सबसे अहम है। हमने यह जानने की कोशिश की कि एक बेहतर टीचर अपनी कक्षा में कितना सकारात्मक बदलाव (अंकों के लिहाज) ला सकता है। हमें पता चला कि अच्छा टीचर मात्र एक साल के भीतर अपनी कक्षा की परफॉरमेंस में दस प्रतिशत तक सुधार ला सकता है। यह  बहुत  महत्वपूर्ण बात है। हमें अच्छे टीचरों को सम्मानित करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि दूसरे शिक्षक भी उनसे सीखें। मेरा मानना है कि एक अच्छा टीचर लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए हमें अच्छे टीचर तैयार करने ही होंगे। और यह सब अपने आप नहीं होगा। सरकार अपने आप इन चीजों पर ध्यान नहीं देती है। निजी क्षेत्र को भी इन बातों में दिलचस्पी नहीं है। इसलिए आप जैसे लोगों को ही आगे आना होगा और दूसरे ऐसे ही लोगों को इसके लिए प्रेरित करना होगा। मुझे उम्मीद है कि इन समस्याओं के समाधान निकलेंगे। अगर आप और हम कोशिश करेंगे तो, जरूर कुछ अच्छा होगा।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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