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चुनाव आयोग को चुनौती देना खतरनाक

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत चाहे किसी की भी हुई हो, पर मैन ऑफ द मैच रहे मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरेशी। मूर्तियों को ढकने से लेकर केंद्रीय मंत्रियों के आपत्तिजनक भाषणों के बीच यह चुनाव विवादों के कई दौर से गुजरा, पर उसके बाद भी आयोग को शांतिपूर्ण चुनाव करवाने में सफलता मिली। खासकर उत्तर प्रदेश में, जहां चुनावी हिंसा की घटनाएं हमेशा होती थीं। इस जिम्मेदारी के पूरा होते ही उनसे बातचीत की प्रवीण प्रभाकर ने। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश:

पांच राज्यों के चुनावों के दौरान क्या चुनौतियां आईं। आप इनसे कैसे निपटे?
सबसे बड़ी चुनौती थी- पीसफुल, फ्री ऐंड फेयर इलेक्शन करवाने की। इसके लिए साल भर पहले से डिटेल प्लानिंग शुरू हो गई थी। कोई भी पहलू न छूटे, इसे हमने तय किया। दूसरी चुनौती वोटर टर्न आउट की थी। खासतौर पर यूपी में वोटर टर्नआउट काफी खराब था। शहरों में तो अन्य जगहों पर भी खराब होता है, पर यूपी में देहात में भी वोटर टर्नआउट कम था। इसे हमने पूरे देश के लिए चैलेंज माना। दो साल पहले मतदाताओं को शिक्षित करने का विभाग बनाया गया। लोगों की जानकारी, नजरिया, बर्ताव व व्यवहार को लेकर सर्वे कराए गए। यूपी में तो क्रांतिकारी काम हुआ। युवाओं, बच्चों व टीचरों के जागरूकता अभियान से जोड़ा गया। ललितपुर में 115 किलोमीटर की ह्यूमन चेन बनाई गई। हमने 500 किलोमीटर की रैली भी निकाली। मीडिया का सहयोग मिला। हमने संपादकों से वोटर को जागरूक बनाने के लिए मदद मांगी। फिल्म स्टारों व अन्य हस्तियों की अपीलें छापी गईं। खुद अखबार की तरफ से बार-बार अपील की गई। जागरूकता के कॉलम लिखे गए। 

महिलाओं का वोट प्रतिशत बढ़ने के क्या मायने हैं?
हमारी कोशिशें सफल रहीं। पहले अक्सर महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब मिलते थे। इस बार इसे ठीक किया गया। औरतों को ध्यान में रखकर जागरूकता अभियान चलाए गए। चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था की भूमिका भी अहम होती है। इस बार यूपी में बड़े पैमाने पर गैरकानूनी हथियार जब्त किए गए, ताकि बेखौफ होकर लोग वोट देने निकलें। औरतों ने भी बेखौफ होकर वोट डाले।

इस बार भी ढेरों नोटिस जारी किए गए। क्या इतना भर ही काफी है?
इतना बड़ा चुनाव था। कई चरणों में वोट पड़े। साढ़े पंद्रह करोड़ वोटर थे। ऐसे में, दो-तीन घटनाएं घटीं, जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं, पर इतनी सीरियस भी नहीं कि हम छाती पीटते रहें। उन्होंने गलती की, हमने नोटिस जारी किया और फिर उन्होंने माफी मांग ली। मॉडल कोड को छेड़ना नादानी होगी। यही प्रभावी औजार है अच्छे चुनाव का। पिछले कुछ वर्षों में कोई भड़काऊ भाषण व निजी हमले नहीं हुए, जबकि ये एक जमाने में खुलेआम होते थे। यह भी समझने की जरूरत है कि मॉडल कोड किसी कानून के एवज में नहीं है। जहां कानून का इस्तेमाल हो सकता है, हम करते हैं। इसलिए चुनाव के दौरान पांच हजार के करीब एफआईआर दर्ज किए। आचार संहिता उल्लंघन के मामले में नेताओं पर जो टीका-टिप्पणी हो रही है, ये क्या कम सजा है? सुप्रीम कोर्ट ने मॉडल कोड पर अपनी मुहर लगा रखी है कि इसका कड़ाई से पालन हो और इस मामले में चुनाव आयोग ही लास्ट वर्ड है।

तो जो 20-30 साल से इतना अच्छा चल रहा है, उसमें बदलाव की क्या जरूरत?
राष्ट्रपतिजी को भी खत लिखना पड़ा।
इसलिए खत लिखा कि एक मंत्री ने मॉडल कोड का उल्लंघन किया था। हमने नोटिस जारी किया। बाद में चुनाव आयोग को चैलेंज करना, एक खतरनाक डेवलपमेंट दिखा। अब क्या किया जाए, मॉडल कोड में इसका जिक्र ही नहीं था। असामान्य घटना घटी, तो इसका हल भी असामान्य ही निकलना था। राष्ट्रपतिजी को लिखा कि देश के कानून मंत्री का काम सांविधानिक अधिकारों व संस्थाओं को संभालना व पुष्ट करना है, अगर वहीं चैलेंज करेंगे, तो यह खतरनाक होगा। इसका खातिरख्वाह ये हुआ कि 24 घंटों के अंदर उन्होंने उन्होंने माफी मांगी।

आप ‘राइट टु रिकॉल’ व ‘राइट टु रिजेक्ट’ के विरोधी क्यों हैं?
‘राइट टु रिकॉल’ का मैं विरोधी हूं। हमारा सिस्टम स्थिर है। अगर हम जन- प्रतिनिधि से खुश नहीं होते हैं, तो उन्हें पांच साल बाद हटा देते हैं। यहां तक कि पूरी सरकार बदल देते हैं। पांच साल में एक बार ‘राइट टु रिकॉल’ का हक तो मिलता ही है। बीच में अगर उपचुनाव हुए, तो वहां भी जनता फैसला सुना देती है। फिर, इसकी प्रक्रिया काफी लंबी है। दस्तखत की जांच-पड़ताल कौन करेगा? फिर चुनाव होंगे। ‘राइट टु रिजेक्ट’ में भी यही कहना है कि बार-बार चुनाव की नौबत न आए।

चुनावी ताम-झाम काफी खर्चीले होते जा रहे हैं?
मसल पावर कंट्रोल हो गया है, पर मनी पावर कायम है। पिछले साल हमने खर्च निगरानी विभाग बनाए। इसके मुताबिक, हमने तय किया कि प्रत्येक उम्मीदवार अपना एक अलग बैंक खाता खोले और उससे चुनाव प्रचार में खर्च करे। हम शैडो अकाउंट रखते हैं, जिनके जरिये उम्मीदवारों के खर्चों का हिसाब रखा जाता है। चुनाव प्रचार की वीडियो रिकॉर्डिग कराई जाती है। इस बार पांच राज्यों के चुनाव में करीब 52 करोड़ रुपये पकड़े गए। पहले गाड़ी की सीट पर थैले रखे होते थे। फिर गाड़ी के दरवाजों पर आ गए हैं। उसके बाद एंबुलेंस वैन से पैसे जाने लगे। अब बेनामी ट्रांजेक्शन तो है। आखिर ब्लैक मनी पर कंट्रोल करना तीस दिन में संभव नहीं है। एक पार्टी करोड़ों खर्च करेगी, तो दूसरा हजार में चुनाव नहीं जीत सकती। इसे रोकने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

इस बार तो पंजाब में ड्रग्स के मामले भी सामने आए। 
सीमा पार से ड्रग्स के खेप आए। लोगों ने बताया कि यहां चुनाव में ड्रग्स बांटे जाते हैं। हमने नारकोटिक्स विभाग, बीएसएफ व पारामिलिटरी फोर्स के साथ मिलकर 53 किलो हेरोइन जब्त की। ऐसी समस्या देश में और कहीं नहीं देखी।

अभी तो आगे भी कई चुनाव हैं?
12 उपचुनाव होने हैं। उसके बाद राज्यसभा का चुनाव है। फिर हिमाचल प्रदेश व गुजरात के चुनाव हैं। सो हमारा फोकस चुनाव कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने पर है।

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