DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जब राज्यों के चुनावों ने फिजा बदली

कुछ विधानसभा चुनाव भी राष्ट्रीय महत्व के होते हैं। ऐसा पहला चुनाव 1957 में केरल विधानसभा के लिए हुआ था, जिसमें सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हरा दिया था। उसी दशक की शुरुआत में कम्युनिस्टों ने भारत सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया था, जिसका उद्देश्य एक पार्टी की तानाशाही स्थापित करना था। उन्होंने बाद में हथियार छोड़ दिए और मुख्यधारा में आकर 1952 के पहले आम चुनाव में हिस्सा लिया। उस चुनाव में कांग्रेस आसानी से जीत गई थी, लेकिन भाकपा लोकसभा में सबसे बड़े विरोधी दल के रूप में उभरी।

1957 में भाकपा की जीत ने उसे कांग्रेस के एकछत्र राज के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी की तरह खड़ा कर दिया। इसीलिए कम्युनिस्ट विरोधी शक्तियों का वहां एक गठबंधन बन गया, जिसमें कैथोलिक चर्च, नायर सर्विस सोसायटी और खुद कांग्रेस पार्टी शामिल थी। इस गठबंधन ने एक विधिवत चुनी हुई सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाए, जिसके बाद उस सरकार को केंद्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। 1960 में हुए मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस ने केरल में फिर सत्ता हासिल कर ली।

जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु तक देश में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। 1967 में ऐसे पहले आम चुनाव हुए, जिनमें नेतृत्व करने के लिए नेहरूजी नहीं थे। इन चुनावों में भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी ने केंद्र में तो सत्ता हासिल कर ली, लेकिन तमिलनाडु (जिसे तब मद्रास कहा जाता था) में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम ने ठीकठाक बहुमत हासिल किया। इसके पीछे कांग्रेस विरोधी, केंद्र सरकार विरोधी और उत्तर भारतीयों के खिलाफ लहर थी, जो प्रशासनिक आदेश से हिंदी थोपने के खिलाफ पैदा हुई थी।

मद्रास को कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था, इसलिए यह कांग्रेस की बहुत जबर्दस्त हार मानी गई।  लेकिन 1967 में उसे पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों और असंतुष्ट कांग्रेसियों के एक गठबंधन से भी हार स्वीकारनी पड़ी और बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा उड़ीसा में भी गैरकांग्रेसी गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब हो गए। यह तब कुछ अचरज से कहा जाता था कि दिल्ली से हावड़ा तक के सफर में एक भी कांग्रेस शासित राज्य से नहीं गुजरना पड़ता।

इन पराजयों के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी छवि एक समाजवादी नेता की बना ली। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, राजाओं के प्रिवीपर्स छीन लिए और गरीबी हटाओ के चमकीले नारे के साथ समय से पहले आम चुनाव करवा दिए। इससे कांग्रेस को केंद्र में भारी बहुमत मिल गया और उसने कई राज्य विधानसभाओं में भी फिर से कब्जा कर लिया। जनवरी 1971 में इंदिरा गांधी की जीत के बाद उसी साल के अंत में जंग के मैदान में भी उन्हें उतनी ही जबर्दस्त जीत हासिल हुई।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता का कुछ श्रेय मुक्ति वाहिनी को और कुछ भारतीय सेना को मिला, लेकिन ज्यादा श्रेय भारतीय प्रधानमंत्री को मिला। इंदिरा गांधी ने लाखों शरणार्थियों को शरण देकर अपना मानवीय पक्ष उजागर किया और एक जंग जीतकर अपनी राजनीतिक समझदारी भी स्थापित की। लेकिन इन दो विजयों ने उनमें अहंकार की भावना जगा दी। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस ने केंद्र और कई उत्तरी राज्यों में सत्ता गंवा दी।

राष्ट्रीय महत्व के अगले विधानसभा चुनाव 1983 में हुए। उस साल कांग्रेस ने पहली बार कर्नाटक में सत्ता खोई, बल्कि उसकी सबसे हैरतअंगेज हार आंध्र प्रदेश में हुई। वहां पर भी वह कभी नहीं हारी थी। राजीव गांधी के हाथों राज्य के मुख्यमंत्री के अपमानित होने के बाद एनटी रामाराव नामक एक मशहूर फिल्म अभिनेता ने तेलुगू अस्मिता को स्थापित करने के लिए एक पार्टी बनाई। तेलुगू देशम पार्टी का कोई इतिहास नहीं था, कोई संगठन नहीं था, न उसके पास धन था और न ही उसकी कोई विचारधारा थी।

मीडिया, खासकर अंग्रेजीभाषी मीडिया के मुताबिक, इस पार्टी का कोई भविष्य नहीं था। लेकिन एक आदमी की लोकप्रियता और ऊर्जा ने कांग्रेस के इतिहास, धन और संगठन को हरा दिया। इसके पहले तक उससे जीतने वाले कम्युनिस्ट, द्रमुक और जनता पार्टी में अनुभवी राजनेता थे और मजबूत संगठन भी था।

उत्तर प्रदेश में अभी-अभी हुए चुनाव भी ऐतिहासिक धारा में एक महत्वपूर्ण मोड़ हैं। 1957 में केरल, 1967 में तमिलनाडु, 1977 में पश्चिम बंगाल और 1983 में आंध्र प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस एक विशाल पार्टी थी। लेकिन इस बार के चुनावों में वह हाशिये की पार्टी थी, जो किसी तरह अपना खोया प्रभाव पाने की कोशिश कर रही थी। उत्तर प्रदेश के चुनाव का खास महत्व इसलिए भी है कि कांग्रेस के सबसे महत्वपूर्ण युवा नेता राहुल गांधी ने यहां अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी। यह बताया गया था कि उनकी नजर में उत्तर प्रदेश का चुनाव 2014 में होने वाले आम चुनाव का सेमीफाइनल था। दूसरी पार्टियों के लिए भी दांव बहुत बड़ा था।

भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय महत्व उत्तर प्रदेश से ही शुरू हुआ था, जहां उसने 1980-90 के दशक में यदा-कदा सत्ता संभाली थी, लेकिन जिसका प्रभाव बहुत घट गया था। अगर उसे कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करना था, तो उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करना जरूरी था। इस बार का चुनाव बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण था। समाजवादी पार्टी सत्ता फिर से पाने के लिए संघर्ष कर रही थी, तो बसपा सत्ता में बने रहने के लिए। दोनों पार्टियों के लिए इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन का केंद्र में उनके प्रभाव को बढ़ाने का अवसर था।

नतीजे आने पर, जाहिर है, सपा बहुत खुश होगी और बाकी तीनों पार्टियां बहुत दुखी। यह खुशी और दुख सामूहिक भी है और व्यक्तिगत भी। नतीजे आने के बाद एक शुरुआती खबर में लिखा था, ‘यादव युवराज की जीत, गांधी युवराज की हार।’ पिछले वर्ष से ही अंग्रेजी मीडिया ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के अभियान के बारे में बहुत चर्चा की थी। उसने विस्तार और प्रसन्नता से राहुल के दलित घरों में ठहरने और जाट किसानों से मिलने की खबरें छापी थीं।

इस बीच अखिलेश यादव अपने गृह राज्य में लगातार मेहनत करते रहे, उन्होंने नई दिल्ली के सुरक्षित माहौल से वहां यदा-कदा दौरे नहीं किए। जब एक्जिट पोल ने कांग्रेस की हार बताना शुरू कर दिया, तो चाटुकारों में अपने नेता को बचाने की होड़ लग गई। लेकिन राहुल गांधी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपनी जवाबदेही स्वीकार की।

उत्तर प्रदेश के नतीजे राहुल की पार्टी के लिए और उनके लिए भी काफी बड़ा झटका हैं। अभी से उत्तर प्रदेश से दूर राज्यों में जयललिता और ममता बनर्जी  तथा अन्य क्षेत्रीय नेता कांग्रेस की हार में अगले आम चुनाव में तीसरे मोर्चे की सरकार की संभावनाएं देखने लगे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:जब राज्यों के चुनावों ने फिजा बदली