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कुछ यादें हैं जो पीछा नहीं छोड़तीं

हमारी अच्छी यादें कुछ सालों में ही धुंधली पड़ जाती हैं। लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो जिंदगी भर आपका पीछा करती रहती हैं। कभी पीछा न छोड़ने वाली अपनी ऐसी ही दो यादों को मैं आपसे बांटना चाहता हूं। ये यादें आज भी मेरी नींद उड़ा जाती हैं। ये उस वक्त की हैं, जब मैं लाहौर में वकालत कर रहा था। मैं एक दिन कोर्ट के बरामदे में टहल रहा था। वहीं से कई कमरों के रास्ते निकलते थे। मैं अकेला ही था।

लेकिन मेरे आगे चार-पांच वकील चल रहे थे। वे जोर-जोर से बातें कर रहे थे। चीख-चिल्ला और हंस रहे थे। तभी एक कमरे से चपरासी निकलकर आया। मेरे आगे चल रहे वकील अचानक दौड़ लिए। चपरासी ने मुझे ही पकड़ लिया। मेरे हाथ पकड़कर वह बोला, ‘जज साहब बुला रहे हैं।’ मैं चुपचाप उसके पीछे चल दिया। वह तीन जजों की पीठ थी। उसकी अध्यक्षता एक मुसलमान जज कर रहे थे। मैं उनका नाम याद नहीं कर पा रहा हूं। खैर, वह बुरी तरह उखड़े हुए थे। मुझे देखते ही चिल्लाने लगे। ‘मैं तुम्हें कोर्ट की मानहानि करने के लिए सजा दिला दूंगा। तुम्हारी वकालत पर पाबंदी लगा दूंगा। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कोर्ट रूम के बाहर शोर मचाने की।’

मैं बस सिर हिलाए जा रहा था। अपनी गलती न होने पर भी पछतावे की मुद्रा में खड़ा था। उस दिन घर लौटा, तो कई दिनों तक कोर्ट नहीं गया। वहां जाने का मन ही नहीं करता था। खासा शर्मसार था। मैं चाहता था कि मुझे लेकर तमाम चकल्लसें खत्म हो जाएं। मैं उन कमाल के वकीलों के नाम उजागर नहीं करना चाहता। उनमें से किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह सच कह पाता। जजों को बता पाता कि मैं बेकसूर था।

कुछ सालों के बाद मैं सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मेहरचंद महाजन के सामने था। मुझे सरकार की ओर से एक मामले में पैरवी करनी थी। मैंने जैसे ही बोलना शुरू किया, वह मुझ पर पिल पड़े। दरअसल वह कहना यह चाहते थे कि रईस पिता और खूबसूरत मां की संतान होने से ही कोई कामयाब वकील नहीं हो जाता। उसके बाद भी वह न जाने क्या-क्या बोलते रहे। उनके गुस्से का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। वह मुकदमा अगली तारीख के लिए लटका दिया गया। बंटवारे के बाद भी वह मुझे छोटा दिखाने में लगे रहे। हम तब दिल्ली आ गए थे। रिटायर्ड जस्टिस दिलीप सिंह ने मेरा नाम ‘द ट्रिब्यून’ के संपादक के लिए भेजा था। उस पर महाजन साहब ने कहा, ‘ऐ वी इन्हां दे हवाले कर देयो।’ उनका मतलब मेरे सिख होने से था।

मुझे फिर कभी ट्रिब्यून की संपादकी नहीं मिली। उनका सांप्रदायिक मामला महज मुसलमानों तक सिमटा हुआ नहीं था। उन्होंने उसमें सिखों को भी जोड़ लिया था। मैं उन्हें कभी समझ नहीं सका। हालांकि उनके दोनों बेटों से मेरी अच्छी-खासी पटती रही। वह बड़े वकील थे, जो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तक पहुंचे। लेकिन उनमें बड़प्पन की कमी थी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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