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पत्थरों के पार्क में हर हाथी अकेला है

इस होली में रसिक बिहारी मतदाता के क्या कहने थे। गजब की बात तो यह कि प्रह्लाद इस बार बुआ की गोद से भागकर साइकिल चलाता बाहर निकला। सिर पर लाल टोपी और मुंह पर मुस्कान। दोनों हाथ छोड़कर साइकिल चलाता हुआ। यूपी के मतदाताओं ने इस बार की होली में बड़े-बड़ों को लहंगा पहना दिया। वहां होली के रंग अभी तक मेहंदी की तरह रचे हुए हैं। यूपी की संस्कृति घूंघट फेंककर ता-थैया कर रही है। अंग-अंग में घुंघरू बज रहे हैं। नौजवान कन्याएं हाय-हाय कर रही हैं कि काश! अखिलेश कुंवारे होते।

नेताजी को देखकर बड़ा संतोष है। बनवास के बाद रामचंद्रजी भी बुढ़ा गए थे। अब कौन पहलवान बुढ़ापे में मुलायम नहीं होता। धरती पुत्र होने से पहले धरती को अम्मा कहना ही पड़ता है। लौह पुरुष का मतलब लोहे का खंबा नहीं होता। इस बार जो नौजवान जीता, वह क्लीन शेव निकला। जिन्होंने हार का जिम्मा लिया, उनकी दाढ़ी बढ़ गई। सबने ऐसी होली खेली, उलटी पड़ गई रायबरेली।

इधर राजभवनों में शामियाने तनने लगे हैं। शपथ ग्रहण की बेला है। बड़ा शालीन मेला है। पत्थरों के पार्क में अब हर हाथी अकेला है। जीते हुए प्रत्याशी नए कुरते-पायजामे में हैं। कई तो सरकारी गाड़ी त्यागकर साइकिल पर आए हैं। जो पुराने खिलाड़ी हैं, वे शपथ क्या लेंगे, उन्हें तो पूरी शपथ रटी हुई है। राज्यपाल के बोलने से पहले वे शपथ ले चुके होंगे। कहीं-कहीं तो यह होगा कि जिस प्रत्याशी को दारोगा ने हवालात में मारा था, वही उनकी चप्पलें साफ करता नजर आएगा। यह भी आशंका है कि जो गुंडाराज की बात करेगा, उसकी बोली बंद कर दी जाएगी। कहते हैं कि शरीर मरता है, आत्मा नहीं मरती। आत्मा जिंदा होकर नाचने न लगे।

इधर नई बात देखने में आई कि साइकिल का पंक्चर ठीक करने वाले भाई लोग ‘सवर्ण मुद्रा’ में आ गए हैं। सुना है कि वे नई सरकार से आरक्षण की मांग करेंगे। उधर लखनऊ और नोएडा के पथरीले हाथी मायूस हैं। उनका कहना है कि इससे अच्छा तो उन पर चादर पड़ी रहती। कांग्रेस राहुल की युवा दाढ़ी पर टिकी थी, वहां तिनका निकल आया। फिर यह भी तय हो गया कि प्लास्टिक के कमल में खुशबू नहीं होती।
उर्मिल कुमार थपलियाल

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