DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

यादों की डुबकी

कौन उनके आसपास मंडरा रहा है। यह उन्हें पता ही नहीं चला। वह तो कहीं डूबे हुए थे। बहुत देर से कोई काम नहीं हुआ था। पूरी टीम परेशान थी। बाद में जब उन्हें होश आया, तब भी वह पूरी तरह उबर नहीं पाए थे। यादें उनका पीछा कर रही थीं और वह बेबस थे।

हम अपनी यादों का क्या करें? कभी-कभी यह बड़ी मुसीबत बन जाती है। इसीलिए शायद डॉ. मार्क डी. व्हाइट मानते हैं कि यादें तो हमारी ताकत होती हैं। लेकिन अगर वे हमें कमजोर बनाएं, तो उस पर विचार करना चाहिए। वह कॉलेज ऑफ स्टेटन आइलैंड में प्रोफेसर हैं। अर्थशास्त्र और दर्शन को मिलाकर उन्होंने बेहतरीन काम किया है। पिछले साल ही उनकी एक खास किताब आई है, ‘कान्टियन एथिक्स ऐंड इकोनॉमिक्स: ऑटोनॉमी, डिग्निटी ऐंड कैरेक्टर।’

यादों के बिना मनुष्य की कल्पना नहीं हो सकती। हम चाहकर भी महज आज में नहीं जी सकते। बीता हुआ कल हमारी जिंदगी में आता-जाता रहता है। हम उससे अछूते कैसे रह सकते हैं? दरअसल, बीता कल आता-जाता रहे, तो दिक्कत नहीं है। लेकिन जब वह चिपक जाए, तो फिर दिक्कत ही दिक्कत है। उसका चिपक जाना ही खतरा है। वह हमारी पूरी ताकत को सोख लेता है। कुल मिलाकर यादें हमारी ताकत बननी चाहिए। यही मार्क कहना चाहते हैं। वे जब हमारी कमजोरी बन जाएं, तो क्या हासिल होगा? ऐसी यादों से हमें अपने को अलग करना ही बेहतर होता है।

मुद्दा यह है कि हम अपने आज को जीने का जरिया बना रहे हैं या नहीं। आज में जीने का कोई विकल्प नहीं है। वही दिक्कत में आ जाएगा, तो हम कहां जाएंगे? सो, यादों में डूबना तो ठीक है, लेकिन वहीं रह जाना अच्छा नहीं है। जब भी हम उनमें डुबकी लगाएं, तब जल्द ही उनसे बाहर भी निकल आएं। दरअसल, डुबकी लगाना हमारे लिए अच्छा है, लेकिन डूब जाना नहीं।
राजीव कटारा

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:यादों की डुबकी