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क्या अब भी सोचेगी कांग्रेस

यह तो वक्त की दीवार पर साफ लिखा था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा तीसरे व चौथे स्थान के लिए संघर्ष करेंगी। ये दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भारत-पाक क्रिकेट टीमों की तरह सेमीफाइनल हार जाने के बाद कांस्य पदक के लिए संघर्ष करने को चैंपियन होना मानती हैं। कांग्रेस को यह मुगालता है कि हर पांच बरस में दस जनपथ के कुछ सुंदर चेहरे चुनावी मंच पर चहलकदमी कर लेंगे और जनता उन्हें ही अपने भविष्य का फैशन डिजाइनर समझ लेगी। जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव के वक्त मुलायम सिंह की तूती बोलने वाली है। पर यह भी गौर कीजिए कि नवीन पटनायक भाजपा से बेरुख हो गए हैं। ममता बनर्जी मूलत: कांग्रेसी ही हैं।

नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा के चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी को सूबे में फटकने नहीं दिया था। जयललिता से करुणानिधि के कारण परहेज करना राजनीतिक बुद्धिमत्ता नहीं है। पर क्या कांग्रेस इन संकेतों को पढ़ना चाहेगी? उत्तर प्रदेश सहित उत्तराखंड, पंजाब और गोवा ने यह सिद्ध किया है कि भ्रष्टाचार व महंगाई के रहते अहंकार का तिलिस्म लगातार टूटता रहेगा। अधिकांश भाजपाई मुख्यमंत्री दबंग की भूमिका में हैं। उन राज्यों में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष कद्दावर नहीं हैं। फिर इस पार्टी ने राजनीतिक शोध, भाषण कला व अपने सैद्धांतिक आग्रहों से परहेज करना शुरू कर दिया है। उसके नेता घमंड में कहते रहे हैं कि इलेक्शन प्रचार से नहीं, मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। ऐसे में विलाप के अलावा राहुल गांधी के पास और भला क्या बचता?
रविवार डॉट कॉम में कनक तिवारी

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