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दृढ़ और शालीन

राहुल द्रविड़ ने जिस गरिमामय ढंग से क्रिकेट से रिटायरमेंट लिया है, वह उनके व्यक्तित्व के अनुरूप ही है। रिटायरमेंट की घोषणा के वक्त उनके साथ अनिल कुंबले भी थे। दोनों में गहरी समानता है। दोनों ही निहायत शरीफ, कम बोलने वाले और विवादों से दूर रहने वाले लोग हैं, जिनका व्यवहार मैदान पर और मैदान से बाहर परिपक्व व विनम्र रहा है। दोनों ही पिछले दो दशकों में भारत को जिताने वाले सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी रहे, लेकिन दोनों को यह श्रेय नहीं मिला।

कपिल देव के बाद अनिल कुंबले भारत के सबसे बड़े या एकमात्र ‘मैच विनर’ गेंदबाज रहे और टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले दुनिया भर के गेंदबाजों में से एक हैं, लेकिन उनके नाम के साथ ग्लैमर कभी नहीं जुड़ा। भारत ने जो मैच जीते हैं, खासकर विदेशी धरती पर, उनमें द्रविड़ का योगदान बतौर बल्लेबाज सबसे महत्वपूर्ण रहा है, पर वह भी कभी ग्लैमरस नहीं बन पाए। तेंदुलकर या गांगुली जैसे चमकदार बल्लेबाजों की चकाचौंध में वह पीछे रह गए। लेकिन दोनों में एक बड़ा फर्क है। कुंबले एक निहायत अबूझ गेंदबाज थे, जिनकी गेंदबाजी का तरीका अपारंपरिक था, वहीं द्रविड़ क्रिकेट की शास्त्रीय शुद्धता की मिसाल थे, जिनकी बल्लेबाजी नौजवान खिलाड़ियों के लिए पाठय़ पुस्तक बन सकती थी।

सुनील गावस्कर के बाद तकनीकी रूप से इतना सही खिलाड़ी भारत में तो क्या, दुनिया में नहीं हुआ। आमतौर पर आकर्षक बल्लेबाज थोड़े लीक से हटकर होते हैं, लेकिन गावस्कर की ही तरह द्रविड़ ने तकनीकी श्रेष्ठता को कलात्मकता की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया था। अपनी विश्वसनीय बल्लेबाजी की वजह से उन्हें ‘द वॉल’ कहा जाता था, पर इस दीवार में कहीं कुछ ऊबड़-खाबड़ नहीं था। उनकी बल्लेबाजी का अंदाज निहायत नफीस व अभिजात था, किसी बड़े शास्त्रीय गायक के गायन की तरह सधा हुआ और कलात्मक। शायद इसीलिए वह फिल्मी गायक की तरह लोकप्रिय नहीं हो सके।

आजकल क्रिकेट इतना प्रतिस्पर्द्धी है और इतना अच्छा करियर है कि खिलाड़ी स्कूल के आगे पढ़ नहीं पाते। द्रविड़ पढ़े-लिखे, बल्कि लगातार पढ़ने वाले क्रिकेटर थे। कहा जाता है कि हर वक्त उनके पास किताबें रहती थीं और मैच के दौरान भी जरा खाली वक्त मिलने पर वह पढ़ते हुए दिखाई देते थे। इसके बावजूद वह क्रिकेट के लिए सबसे ज्यादा मेहनत करने वाले और लगातार अपने को बेहतर बनाने के लिए कोशिश करने वाले खिलाड़ी रहे। उम्र ने उनके खेल पर असर जो डाला वह तो सबके सामने है, लेकिन 39 वर्ष की उम्र में भी उनकी फिटनेस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।

अपनी फिटनेस और एकाग्रता की वजह से ही जहां सचिन तेंदुलकर के बाद द्रविड़ टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले भारतीय खिलाड़ी हैं, वहीं सबसे ज्यादा कैच पकड़ने का विश्व रिकॉर्ड भी उनके ही नाम है। भारतीय क्रिकेट की यह एक गौरवशाली पीढ़ी थी, जिसने भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और अब एक-एक करके ये खिलाड़ी रिटायर हो रहे हैं। गांगुली, द्रविड़, लक्ष्मण, तेंदुलकर और अनिल कुंबले ऐसे खिलाड़ी हैं, जो एक साथ दुनिया की सबसे ताकतवर टीमों को चुनौती दे सकते थे।

द्रविड़ खेल में आक्रामक व दृढ़ थे, लेकिन व्यवहार में निहायत सुसंस्कृत और शालीन। सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं, जीवन के तमाम क्षेत्रों में हमारे नौजवान राहुल द्रविड़ के समर्पण, दृढ़ता, शालीनता और विनम्रता से सबक ले सकते हैं। हम सब चाहते तो यही थे कि द्रविड़ की विदाई शानदार प्रदर्शन के साथ हो, लेकिन ऐसा न होने के बावजूद इस बड़े खिलाड़ी ने उसी गरिमा के साथ मैदान छोड़ा है, जिसके साथ वह अब तक खेलते रहे।

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