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विद्या और कोलकाता कहानी के हीरो हैं!

झंकार बीट्स, होम डिलीवरी और अलादीन के बाद अब सुजॉय घोष कहानी लेकर आए हैं। इसके दो आकर्षण हैं। एक तो कोलकता की दुर्गा पूजा के रंग और दूसरी विद्या बालन। सुजॉय इन दोनों को फिल्म का नायक मानते हैं। फिल्म से जुड़े सुजॉय के अहसास उन्हीं के शब्दों में।

सबसे बड़ी कामयाबी
अद्भुत! इससे पहले मेरी अब तक की जिंदगी में इतनी अधिक तवज्जो मुझे कभी नहीं मिली। मेरी पहले की फिल्म झंकार बीट्स हो या होम डिलीवरी या अलादीन, मीडिया व दर्शकों मे से किसी ने भी मुझे इतनी तवज्जो नहीं दी थी, जितनी तवज्जो कहानी के पहले प्रोमो के साथ ही मिलने लगी। यह मेरी अब तक की सबसे बड़ी कामयाबी है।

कहानी की कहानी
मुझे लंबे समय से यह बात कुरेद रही थी कि नारी के उस पक्ष को पेश किया जाना चाहिए जिसमें मां बनते ही वह पूरी तरह से बदल जाती है। वह अचानक अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर इस कदर जागरूक रहने लगती है कि उसके लिए कोई भी कदम उठा सकती है। एक मां उस लड़की या औरत से एकदम अलग हो जाती है, जिसे हम पहले से जानते रहते हैं। वह किसी भी सूरत में बच्चे को कोई नुकसान नहीं होने देती। इस मूल सोच के बाद मैंने सोचा कि अगर एक मां बन रही यानी गर्भवती औरत को खतरनाक माहौल में रखा जाए तो वह किस तरह अपने बच्चे की रक्षा करेगी। बस इसी सोच के साथ जब पटकथा लिखने बैठा तो हमारी फिल्म कहानी की पटकथा तैयार हो गई। हमारी फिल्म में छह माह की गर्भवती विद्या बागची अपने पति अर्णब बागची की तलाश में लंदन से कोलकता आती है। और उसे तमाम असामान्य परिस्थितियों से जूझना पड़ता है।

विद्या बालन क्यों?
मेरे दिमाग में सब्जेक्ट का एक ढांचा था। इस ढांचे को सुनकर ही विद्या बालन ने इस फिल्म से जुड़ने के लिए हामी भरी थी। पर उसकी शर्त थी कि अंतिम फैसला वह पूरी पटकथा पढ़ने के बाद करेगी। एक तरह से देखा जाए तो हमारी फिल्म के साथ विद्या बालन शुरू से ही जुड़ी हैं। विद्या की हां के बाद मैंने पटकथा लिखनी शुरु की, लिखते समय सदैव मेरे दिमाग में विद्या बालन ही रहीं। पटकथा लिखते समय मैं बीच बीच में उसे सुनाता रहता था और उसकी राय के अनुसार कुछ जरूरी बदलाव भी करता गया। जब पटकथा तैयार हुई तो उसने एक साथ फिर से पूरी पटकथा सुनी और एक बदलाव की बात कही, चूंकि हमें सही लगा इसलिए हमने वह बदलाव कर दिया। हालांकि विद्या बालन आज स्टार बन गई हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनकी डर्टी पिक्चर वाली छवि का कुछ असर मेरी कहानी पर पड़ेगा।

कोलकाता के रंग
कहानी में जो कोलकाता नजर आएगा, उस तरह से अब तक कोलकाता को किसी भी अन्य फिल्म में पेश ही नहीं किया गया। कोलकता शहर का अर्थ सिर्फ हावड़ा ब्रिज या विक्टोरिया मेमोरियल ही नही है। हमने कोलकता की हर गली और सड़क पर अपनी फिल्म को फिल्माया है। कोलकता की सड़कों, दफ्तरों व घरों में विद्या जाती हैं। वो सारी वास्तविक लोकेशंस हैं। हमने इस फिल्म को दुर्गा पूजा के समय फिल्माया है इससे फिल्म को असली लुक मिला। हालांकि कोलकाता में शूटिंग करना आसान नही रहा। विद्या बालन को देखने, उनसे मिलने के लिए लोग आतुर रहते थे। कई बार विद्या बालन को वहां इकट्ठे हुए लोगों से बंगला भाषा में बात भी करनी पड़ती थी। चूंकि मैं कोलकाता से हूं इसलिए मैं कोलकाता की हर बात से वाकिफ हूं। वहां के सारे रंग मैंने देखे हैं। उन्हीं रंगों को कहानी में शामिल किया है।

संगीत में एकला चलो रे...
फिल्म के संगीतकार विशाल शेखर हैं। उन्होंने हमारी फिल्म के लिए खासतौर पर संगीत तैयार किया है। पर फिल्म में सभी गाने बैकग्राउंड में ही हैं। वह अब तक मेरी हर फिल्म को संगीत देते रहे हैं, इसलिए हमारे बीच एक अच्छी ट्यूनिंग भी है। फिल्म के अंदर रवींद्रनाथ टैगोर की कविता एकला चलो रे को  इसलिए रखा है क्योंकि मैं रवींद्र नाथ टैगोर का बड़ा फैन हूं। उनकी इस कविता का प्रशंसक हूं और मेरी दिली ख्वाहिश थी कि चूंकि मेरी फिल्म कोलकता की पृष्ठभूमि पर है तो इसमें यह कविता जरूर रहे। चूंकि अमिताभ बच्चन की आवाज के कायल सब हैं इसलिए हमने यह कविता उनकी आवाज में रिकॉर्ड की। यह प्रयोग लोगों को पसंद भी आ रहा है।
शांतिस्वरूप त्रिपाठी

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