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जाट बहुल इलाके में हार का कारण तलाशेगा रालोद

कांग्रेस के साथ गठबंधन करके उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अच्छी जीत का सपना संजोने वाला राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अपने समर्थन के जाट इलाके में हार का कारण तलाश करेगा।

रालोद अध्यक्ष अजित सिंह ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस बारे में एक अलग रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। पार्टी यह जानना चाहती है कि ऐसे कौन से कारण थे कि उसे समर्थन वाले जाट बहुल इलाके में भी हार का सामना करना पडा़। इस मामले में अगले सप्ताह दिल्ली में बैठक बुलाई गई है।

विधानसभा के 2007 के चुनाव में भी रालोद की इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी। पार्टी ने अकेले चुनाव लडा था और दस सीटें जीती थीं लेकिन इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद उसे नौ सीट ही मिल सकी है। पार्टी के एकमात्र वर्तमान विधायक पूरन प्रकाश मथुरा की बलदेव सीट से जीतने में सफल रहे जबकि विधानसभा में विधायक दल के नेता कोकब हमीद समेत सभी प्रत्याशी चुनाव हार गए।

रालोद को अब विधानसभा या लोकसभा की एक सीट गंवानी पडे़गी। पार्टी के महासचिव और मथुरा से सांसद जयंत चौधरी मथुरा की मांठ सीट से चुनाव लडे़ थे और जीत गए। मांठ भी जाटों के प्रभुत्व वाला इलाका है। चौधरी यदि विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे देते हैं तो पार्टी के आठ विधायक ही रह जाएंगे। रालोद ने 46 सीटों पर चुनाव लडा़ था। पार्टी नौ सीट जीतने में सफल रही और उसे 2.33 प्रतिशत मत मिले।

पार्टी के नेता पुराने कार्यकर्ताओं और कुछ मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं देने को हार का एक कारण मान रहे हैं। पार्टी आलाकमान ने विधायक अजय तोमर, सतेन्द्र सोलंकी, अनिल चौधरी तथा वारिस अली को प्रत्याशी नहीं बनाया था।

रालोद अध्यक्ष ने पार्टी के पदाधिकारियों को भी उस बैठक में शामिल होने को कहा है जिसमें हार के कारणों की कार्यकारिणी की रिपोर्ट रखी जाएगी।

रालोद के एक वरिष्ठ नेता ने गुरुवार को कहा कि पार्टी जाट वोट के समर्थन पर ही टिकी हुई है। यदि यह वोट बैंक खिसक गया तो पार्टी को काफी मुश्किल होगी। बैठक के बाद संगठन में भारी फेरबदल से भी वरिष्ठ नेता ने इन्कार नहीं किया। बैठक में जाट वोट को पाले में लाने पर भी विचार विमर्श होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इसके बावजूद रालोद अभी कांग्रेस का साथ छोड़ने के बारे में सोच नहीं सकता।

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