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भागीदारी ही बराबरी का सपना पूरा करेगी

आधी आबादी ने देश पर हुकूमत करने के बाद भी नैसर्गिक जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा। यह संतुलन और आत्मशक्ति महिलाओं में ही हो सकती है। आज की महिला आपसे बराबर का हिस्सा नहीं मांगती वह भागीदारी चाहती है। बराबरी तो अपने विजन, अपनी मेहनत और अपनी क्षमताओं से हासिल हो ही जाएगी। यह मानना है अपने हुनर व साहस से साइबर सिटी का सर ऊंचा करने वाली महिलाओं का।


गोल्डन गर्ल के नाम से मशहूर भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रही और अजरुन पुरस्कार विजेता ममता खरब कहती हैं कि सामाजिक बंधन बेमायने नहीं होते लेकिन अपने वजूद को साबित करने का अधिकार सबको मिलना चाहिए। जिंदगी के अपने लक्ष्य और मायने होते हैं जो जीवन में गरिमा व अनुशासन लाते हैं।

महिला खिलाड़ियों को अच्छे प्लेटफॉर्म व प्रोत्साहन मिले तो राष्ट्रीय खेल के सुनहरे दिन लौट सकते हैं। ममता ने करीब 250 मैचों में 60 के करीब गोल दागे हैं। पर्वतारोही संतोष कहती हैं कि महिलाओं ने इतने असंभव लगने वाले लक्ष्य हासिल किए हैं कि अब कोई भी क्षेत्र दुर्गम नहीं रह गया है। कठिनाईयों से जूझने की प्रवृत्ति महिलाओं में सदियों से रही है। लक्ष्य निर्धारित होने पर वह नए रूप में सामने आती है।

पद्मश्री से सम्मानित संतोष यादव के नाम एक साल से भी कम अवधि में दो बार माउंट एवरेस्ट चढ़ने का रिकॉर्ड है। स्वीमर शिवानी कहती हैं कि सफलता की नींव बचपन में ही तैयार होती है। घर में इसकी पहली इबारत लिखी जाती है। आत्मविश्वास और अभ्यास से लबरेज महिला पूरे समाज के लिए गौरव की बात होती है। शिवानी को बैक स्ट्रोक में महारत हासिल है। शिवानी ने सालभर में करीब आधा सैकड़ा मैडल जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर जीते हैं। समाजसेवी व कई महत्वपूर्ण संगठनों की सदस्य अमीना शेरवानी कहती हैं कि महिलाओं में नेतृत्व की स्वाभाविक क्षमता होती है। प्रकृति ने उन्हें विश्लेषण करने व सबको साथ लेकर चलने का गुण दिया है। अब महिलाएं पूरे वर्ग के हक के लिए लड़ती हैं और इसके लिए उन्हें लोगों के भरोसे व समर्थन की जरूरत होती है किसी के सहारे की नही।

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