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जीविका से बदली जिंदगी

इस बार के महिला दिवस की थीम है ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण। इसकी मिसाल हैं बिहार के बोधगया जिले की महिलाएं, जो विश्व बैंक की आर्थिक सहायता से चल रहे प्रोजक्ट जीविका से जुड़ीं और खुद की जिंदगी संवारी। इन महिलाओं ने शिक्षा हासिल की, रोजगार शुरू किए, आसपास की दूसरी महिलाओं के समूह बनाए और कारोबार करके आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की। साथ ही अपनी सेहत सुधारी और परिवार नियोजन के महत्व को समझा। इन महिलाओं से बोधगया जाकर इनकी सफलता की कहानी सुनी निशि भाट ने।

खुद के साथ संवारी 13 महिलाओं की तकदीर
बोधगया के बारा गांव में रहने वाली विमला देवी बेहद निर्धन परिवार से हैं। घर में पैसों की किल्लत को दूर करने के लिए साहूकार ने उनके घर के बर्तन गिरवी रख कर पांच हजार रुपए उधार दिए। काम नहीं बना तो फिर से तंगी छा गई। चार साल बाद आज विमला बिल्कुल बदल गई हैं, वह अपने जैसी 13 महिलाओं के गुलाब स्वयं सहायता समूह का प्रतिनिधित्व करती हैं। ग्राम प्रधान हो, कलेक्ट्रेट या फिर स्थानीय पुलिस अब वह किसी से अपनी बात कहने में नहीं हिचकतीं। विमला जैसी सैकड़ों महिलाओं में आत्म-विश्वास की यह अलख जीविका ने जलाई है। विमला ने एक साल पहले दस हजार रुपए लिए और उसी पैसे को किराने की दुकान में निवेश कर अब वह हर महीने 15 हजार रुपए कमा रही हैं।

गांव में लिए लोन से शहर में चला काम
बारा गांव की कमला देवी ने दो बार गुलाब स्वयं सहायता समूह के जरिए लोन लिया। पहली बार छह हजार रुपए पेट की पथरी का इलाज कराने के लिए लिया। कमला देवी कहती हैं, पथरी की वजह से परेशानी बढ़ गई थी। वर्ष 2010 में परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी, गुलाब स्वयं सहायता समूह की मदद से छह हजार रुपए का लोन लिया और ऑपरेशन कराया। पति किशोरी रविदास और दो बेटे पप्पू और धर्मेन्द्र कुमार का काम-धंधा अच्छा नहीं चल रहा था। बेटे ने मुंबई और कोलकाता जाकर कैटरिंग व्यवसाय का प्रशिक्षण लिया, उसी का काम आगे बढ़ाने के लिए दोबारा 20 हजार रुपए का लोन लिया, उस लोन की मदद से वह मुंबई में कैटरिंग का काम कर रहा है। अब मार्च महीने में लोन की आखिरी किश्त चुकाई जाएगी।

बीमारी के लिए भी लोन
बेहतर तो यह है कि किसी भी जिले या गांव में एक अदद सरकारी अस्पताल जरूर हो, जहां हर तरह का इलाज हो सके, लेकिन बोधगया में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं सीमित होने के कारण निजी क्लीनिक ही इलाज का विकल्प हैं। उनकी महंगी फीस की समस्या को जीविका ने हल किया और हेल्थ रिस्क इंटरवेंशन के तहत 1599 लोगों ने इलाज के लिए लोन लिया। लोन लेकर पथरी का इलाज कराने वाली कांति देवी बताती हैं कि बीमारी की वजह से घर में काफी परेशानी हो गई थी। गुलाब स्वयं सहायता समूह से छह हजार रुपए उधार लेकर सजर्री कराई। अब स्वस्थ हूं और बेटे के कैटरिंग के व्यवसाय के अलावा घर में दो बकरी, गाय और भैंस भी खरीद ली है।

प्रशिक्षण के लिए गईं हैदराबाद
बोधगया के झिकटिया पंचायत की पांच महिलाओं का समूह वर्ष 2006 में प्रशिक्षण के लिए 15 दिन के लिए हैदराबाद गया। घर की चौखट से निकल कर इतनी दूर जाना आसान बात नहीं थी। हेमंती देवी वह पहली महिला थीं, जिन्होंने सबसे पहले इस प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए हामी भरी, बावजूद इसके कि हेमंती की राह में भी कम मुश्किलें नहीं थीं। पति पियक्कड़ था, पत्नी के घर से बाहर जाने की खबर के साथ ही चरित्र पर अंगुलियां उठाई जाने लगीं। हेमंती ने हिम्मत नहीं हारी, पति के काम पर चले जाने के बाद दोपहर में महिलाओं के साथ बैठक की, दूसरी महिलाओं को भी तैयार किया। खर्चा पानी सब प्रशिक्षण देने वाले ही उठा रहे थे, आज छह साल बाद हेमंती सीआरपी (कम्युनिटी रिर्सोस पर्सन ) बन कर गांव में सहारा स्वयं सहायता समूह के जरिए अगरबत्ती बनाने के काम में जुटी हैं।

बहू ने कराई सास की नसबंदी
20 वर्षीय करुणा देवी के सबसे छोटे देवर की उम्र 9 साल है। सास कुंती देवी के मझोले बेटे और करुणा के पति राजमिस्त्री हैं। करुणा की दो बेटियां और सास के नौ बच्चे मिला कर घर में पन्द्रह लोग हैं। गुलाब स्वयं सहायता समूह से जुड़ कर करुणा ने परिवार नियोजन की जानकारी हासिल की और एक दिन सास को बिना बताए उनका ऑपरेशन करवा दिया। सास को बाद में पता चला तो करुणा ने परिवार नियोजन के लाभ को समझाया। सहायता समूह से 20 हजार रुपए लोन लेकर करुणा ने किराने की दुकान खोली, जिसकी बदौलत अब वह हर रोज 100 रुपए कमा लेती हैं। सास ने भी लोन लिया और अपने पति को चेकरी बाजार में होटल खुलवा दिया। कुल मिला कर घर में 15 हजार रुपए आने लगे। 15 लोगों के खर्च पर 15 हजार रुपए कम नहीं।

महिलाओं के साथ श्रीविधि का साथ
बोधगया के शेखवारा गांव के खेत में हल चलाती दुखनी देवी अपने खेत में जुताई और बुआई का काम खुद ही करती हैं। पहले यह काम पति बिहारी पासवान करते थे, पर उत्पादन की श्रीविधि को समझने के बाद दुखनी ही सारा काम देखती हैं। दरअसल गेहूं के बेहतर उत्पादन के लिए श्रीविधि तकनीक अपनाने वाला गया पहला जिला है। इसके बाद पूर्णिया और नालंदा में श्रीविधि को कई महिलाओं ने अपनाया। श्रीविधि में खेती के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बीज का शोधन और उपचार कर उनकी उत्पादकता को बढ़ाया जाता है। दुखनी देवी बताती हैं कि पहले एक एकड़ भूमि पर 65 किलो बीज का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन अब प्रति एकड़ केवल दस किलो बीज में ही काम चल जाता है, जिससे पिछले साल 5.45 प्रति हेक्टेयर गेहूं का उत्पादन किया गया।

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