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धरती और कुदरत से जोड़ती है होली

यह महज संयोग भर है कि होली और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आज ही हैं। दरअसल, हमारे त्योहार अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक तय नहीं होते। दो अलग-अलग तारीख हैं- एक चंद्रमा से चलती है और दूसरी सूर्य से (अंग्रेजी कैलेंडर)। तो हमारे सारे त्योहार हमारे अपने पंचांग के तहत होते हैं। हम यह नहीं कह सकते हैं कि होली आठ मार्च को है या यह हर साल आठ मार्च को ही मनाई जाती है। वैसे भी आज दोपहर बाद रंगों की होली है। उससे पहले तक होलास्टक है, जिसे हम अशुभ मानते हैं।

खैर, हमारे त्योहारों की तिथि तय होने की तीन वजहें होती हैं। पहली वजह, हमारी खेती है। दूसरी, ऋतु चक्र और तीसरी पुराण कथाएं। हम पुराण कथाओं को मिथक नहीं कह सकते। मिथक अंग्रेजी के मिथ या माइथोलॉजी से आया है, इनमें किंवदंती और कल्पना के आधार पर गढ़ी गई बातें होती हैं, जबकि पुराण का मतलब है पुरातन काल में घटी घटनाओं की स्मृति, हमारी श्रुत-स्मृति की परंपराओं में संजोई गई घटनाएं। होली भी हमारी श्रुत-स्मृति परंपरा में बसी है।

वसंत पंचमी के जाने के बाद, जो रंग-रंग के फूल खिलते हैं, वे होली व उसके कुछ दिनों बाद तक रहते हैं। ग्रीष्म-चैत्र के आते ही ये सारे फूलों के रंग अलग हो जाते हैं। तो यह रंगों का त्योहार है, परंतु लाल-पीले रंगों तक ही यह सीमित नहीं। जीवन में अनेक अनुभव होते हैं, संवेदनाएं होती हैं, रस व दर्शन होते हैं। इनका दर्शन हम प्रतीकों के तौर पर रंगों में करते हैं। जरा सोचिए, जीवन अगर बिल्कुल बेरंगा हो तो...? यकीनन, वह जीवन जीने लायक नहीं रहता।

हमारी लहलहाती फसलें, हरी डंडियों पर पीले फूलों वाली सरसों, अब तैयार हो गई हैं। इसी खेत, खेलिहान व खुशी का त्योहार है होली। जो लोग शहरों से दूर रहते हैं और जिनका जुड़ाव धरती से है, वे इस महत्व को बखूबी समझ सकते हैं। मेरे एक मित्र अक्सर कहा करते थे कि दिल्ली का वातावरण राजनीतिक, सामाजिक दरबारी वाला है। कश्मीर में बर्फबारी होती है, तो यहां सर्द हवाएं चलती हैं और रेगिस्तान में रेत उड़ती है, तो यहां लू। होली मनाने का कारण धरती से जुड़ा है। फसलों के लहलहाने और उन्हें काटने में किसान आनंद की अनुभूति पाते हैं और उनके रंगों में रंग जाते हैं। सोंधी मिट्टी की खुशबू, पेड़-पौधों और जानवरों से उनके जुड़ाव को आप होली में पा सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में जो कंक्रीट-सीमेंट से हमारा अप्राकृतिक लगाव बढ़ा है, वह वैसा ही है, मानो सांप चला जाता है, उसके निशान रह जाते हैं। तो निशान के तौर पर अब भद्दे रंग, कीचड़, धूल, पानी और मद, दारू और एक दिन की छुट्टी, यही सब बचे हैं। हमारे हरेक त्योहारों की तरह होली के भी अपने गाने, नृत्य व पकवान हैं। गुझिया व ठंडई क्यों बनती हैं? एक का तो नाम ही है ठंडई, यानी गरमी से राहत दिलाने का पेय। कहते हैं कि इस मौसम में आपको मीठा खाना चाहिए, क्योंकि इससे आपका वात, पित्त, कफ संतुलित रहता है। गुझिया में मेवा होता है, जो सबसे ज्यादा पौष्टिक तत्व है।

भगवान विष्णु के दशावतार में चौथा अवतार था नरसिंह का, धड़ से ऊपर का हिस्सा सिंह और नीचे का मनुष्य। हिरण्यकश्यपु बहुत ही बलवान, तेजस्वी व चक्रवर्ती राजा था। लेकिन उसका वही हाल हुआ, जो अन्य चक्रवर्तियों का हुआ। इस सत्ता-मदांध राजा ने ब्रह्मा की तपस्या की और उनसे वरदान मांगा कि मैं अमर रहूं। लेकिन यह तो हो नहीं सकता था, तो उसने कहा कि मैं किसी भी अस्त्र-शस्त्र, आयुध से न मरूं। मेरी मौत न दिन में हो, न रात में। न अंदर, न बाहर। न ऊपर, न नीचे। न जल में, न थल पर। न मनुष्य से, न प्राणी से। ब्रह्माजी के तथास्तु कहते ही उसने खुद को भगवान मान लिया। उसने मुनादी करा दी कि उसके साम्राज्य में किसी की पूजा नहीं होगी, सिवाय उसके।

लेकिन प्रकृति के नियम को देखिए, उसी का बेटा प्रह्लाद नारायण का परम भक्त निकला। बौखलाए हिरण्यकश्यपु ने उसे तरह-तरह की यातनाएं दीं। जब वह थक-हार गया, तो हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका ने याद दिलाया कि उसे अग्नि में नहीं जलने का वरदान प्राप्त है। वह प्रह्लाद को लकड़ियों के ढेर पर ले जाकर बैठ गई और आग लगा ली। होलिका खुद जल गई, प्रह्लाद बच गया। अब होली से पहले होलिका दहन का आशय साफ हो जाता है।

खैर, नाराज हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद से कहा- तुझसे बात में निपटूंगा, पहले तेरे भगवान से निपटता हूं। बता, वह कहां है? प्रह्लाद ने कहा, वह तो सभी जगह हैं। हिरण्यकश्यपु ने खंबे की ओर इशारा किया, तो प्रह्लाद ने कहा, वहां भी हैं। राजा ने खंबे पर वार किया, तो उससे भयंकर गजर्ना करते हुए नरसिंह निकले और उन्होंने हिरण्यकश्यपु का वध कर डाला।

इस तरह, होली बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। यह बताता है कि आपकी भक्ति, आपका समर्पण भाव ही आपको विजयी बनाता है। गर्व, मद, अहंकार आपको विनाश की ओर ले जाएगा। अग्नि, जो कि हमारे पंचतत्व का अहम हिस्सा है, वह सभी बुराइयों को जलाकर भस्म कर देती है और अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर करती है। तो हम होली इसलिए भी मनाएं कि ये सारे भाव हमारे मन में जिंदा रहें। समर्पित भाव से कुदरत ने हमें इतने रंग व भाव दिए हैं, उनका धन्यवाद भाव से उपयोग करें।

अब महिला दिवस की चर्चा करते हैं। एक तो मेरी आपत्ति यह है कि इस दिन को महिला दिवस ही क्यों कहते हैं, महिला-पुरुष दिवस क्यों नहीं? कहीं पुरुषों ने इस दिवस को मनाने, पटाने और घुमाने के खयाल से तो नहीं बनाया है? सुंदर साड़ी, सोने-चांदी के गहने और फिल्में दिखाकर बहलाने की प्रवृत्ति काफी पुरानी है। खैर, इस दिन हम तीन मुद्दों को उठाते हैं। ये तीन मुद्दे हैं, ट्रिपल ई। यानी एजूकेशन, एंपावरमेंट और इनलाइटमेंट। महिला सशक्तीकरण की बात होती है। अब भला शक्ति को सशक्तीकरण की क्या जरूरत? शब्दों का यह अटपटापन मायाजाल-सा लगता है।

एक तरफ हम नवरात्र मनाते हैं, मंदिर में मां-मां कहकर साष्टांग करते हैं। यह शक्ति रूप के सामने झुकना है, पर वास्तविक जीवन में उसी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं, मजाक उड़ाते हैं। इस ‘ट्रिपल ई’ की जरूरत पुरुषों को है। स्त्री शब्द में जो ‘त्र’ है, वह संस्कृत के त्रयति से आया है। यानी रक्षा करना। शस्त्र, अस्त्र में भी ‘त्र’ है। शक्ति रक्षा करती है। आखिर कहा ही गया है- रचना हूं, चराचर की, मैं नारी हूं, बराबर की।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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