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जिंदगी की इबारत खुद लिखने का दिन

आठ मार्च, महिला दिवस के रूप में क्यों मनाया जाता है, इस तथ्य को हममें से कितने लोग जानते हैं? मानते हैं कि यह एक ऐसा ही दिन है, जो कमजोर मानी जाने वाली स्त्री जाति को सशक्त बनाने का प्रतीक है। पर क्या सचमुच ऐसा है? किसी भी विदेशी आयातित सिद्धांत, संस्कृति से नफरत करने वाले कहेंगे कि इस दिन वहां संघर्ष से महिलाओं को वे अधिकार मिले थे, जिन पर पुरुष व्यवस्था का नियंत्रण था। वोट देने का अधिकार भी उन हकों में से एक था।

भारतीय महिलाओं को लोकतांत्रिक संविधान के चलते वोट देने का अधिकार देश की स्वतंत्रता के साथ दे दिया गया। मुश्किल यह है कि अधिकारों की लिखित दान-महिमा में व्यवहारिकता पर निषेध लगा दिया जाता है। यह रिवाज स्त्री के लिए उसके नासमझ होने का प्रमाण पत्र बन जाता है, जिससे कितने-कितने रास्तों के मुहाने बंद करने में पुरुष सत्ता को सुविधा मिलती है। ऐसा न होता, तो स्त्री का जीवन बंधक क्यों होता जाता? क्या 1947 में आई आजादी सचमुच उसकी आजादी थी? यदि थी, तो वह आज तक मुक्ति को खोजती हुई जानलेवा और आत्महंता स्थितियों से क्यों गुजर रही है? गुलाम अपने मालिकों को कभी नाखुश नहीं करना चाहता, अगर ऐसा करता है, तो गद्दार कहलाता है।

सर्वे किया जाए, तो वरिष्ठ नागरिकों की रायशुमारी में युवतियां गद्दारों की कतारों में खड़ी दिखाई देंगी, क्योंकि वे रूढ़ियों, परंपराओं से डरती-दहलती हुई भी खुदमुख्तारी के रास्ते की ओर चल पड़ी हैं, जिसकी ओर देखना भी उनके लिए गुनाह था। मसलन, मैं विवाह से पहले अपना करियर शुरू करूंगी, मैं लड़कियों के लिए तयशुदा नौकरी नहीं करूंगी, पुलिस, सेना, कोर्ट जैसे महकमे भी देखना चाहती हूं, वगैरह।

सशक्तीकरण या जबरजोरी? इस सवाल पर समाज बौखलाता है। वह आज भी दहेज व लांछनों के कठघरे में घेरकर स्त्री की हत्या या आत्महत्या के लिए मजबूर कर देता है। घर से बाहर सड़क पर उतरती लड़की के साथ बलात्कार किया जाता है कि उसको मालिक बनाम संरक्षक परदे में रखें। कपड़े पुराने कानून के तहत उसे पहनाए जाएं कि हाथ-पांव खुलकर हरकत में न आ पाएं। आंख, कान और वाणी पर कथित शालीनता का पहरा हो। हर दिन जद्दोजहद, हर दिन इंसानी हकों की मांग, हर दिन अधिकारों के कुचले जाने के दृश्य, आखिर आठ मार्च हमारे सामाजिक माहौल पर कब गुजरेगा? गुजरे या न गुजरे, सारी बाधाओं, रुकावटों व खतरों के बीच से गुजरती आज की स्त्री मंजिल की ओर बढ़ तो रही ही है, इस बात से कौन इनकार कर सकता है?

हमें जिंदगी की इबारत स्त्री के विचारों और अधिकारों से लैस होकर लिखते हुए किसी विशेष दिवस की दरकार नहीं, प्रत्येक दिन अपने हक में चाहते हैं। यह चाहत अपने लिए हम ही संभव करेंगे, कोई खैरात में इसे हमें देगा नहीं, क्योंकि मुक्ति ही सबसे अनमोल तत्व है, इंसान के जीवन का...।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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