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उत्सवधर्मिता से दूर

यह रंग उत्सव है, लेकिन उनका चेहरा रंगहीन। कारण, प्रकृति उल्लास के प्रति वह निरपेक्ष हैं। उन्होंने तय किया है कि होली के दिन वह घर से नहीं निकलेंगे। उनकी श्रीमतीजी की भी यही राय है। वे डीवीडी पर फिल्म देखकर समय बिताएंगे। ऐसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, जिनके मन में तीज-त्योहार के दिन उत्साह की लहरें नहीं उठतीं। इनका मन राग छलकाना, नर्तन करना नहीं जानता। दरअसल, इन्हें शहरीकरण और गलत आधुनिक बोध ने दूषित कर दिया है। वे घरघुस्सू बने हैं और सामाजिकता की भावना उनसे बिला गई है।

एक समय था, जब उल्लासमय होने से हमारी पहचान थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत आए थे, होली के रंगों से भीतर तक सराबोर हो गए थे। उन्होंने भारत की एक बड़ी ताकत सामूहिक तौर पर महसूस की जानेवाली उत्सवधर्मिता बताई थी। ऐसी ही सोच बाद में जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने व्यक्त की। समस्या यह है कि उत्सवधर्मिता की हमारी यह ताकत चूक रही है। ऐसा नहीं कि आधुनिकता से इस ताकत का खत्म हो जाना अनिवार्य है।

रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था, ‘सदियां आती-जाती रहेंगी। विकास के नए प्रतिमान गढ़े जाते रहेंगे, लेकिन प्रकृति के सहज प्रभाव और अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस न करने वाला मन सदा बीमार मन ही कहलाएगा। जीवन की एकरसता की जकड़न को शिथिल करना हमेशा हमारी अनिवार्य जरूरतों में ही रहेगी।’ जाहिर है पर्व-त्योहार इस जकड़न को शिथिल करते हैं।

पहले हमारा बसंत राग खोया, फिर फाग राग और अब अपने रंग खो हम रंगहीन बनने पर तुले हुए हैं। हमें चाहिए कि हम रंगों की भाषा समझों। अपनी विरासत और भाईचारे से प्यार करें। अपनी लोकधर्मिता खोने का अर्थ अपने को खो देना है। याद रखें, खुद रंग-अबीर की भाषा समझना जितना जरूरी है, उतना ही यह कि जो नासमझ बनने को आतुर हैं, उनके तन पर रंग उड़ेल उनकी सोच की दिशा बदलना।
नीरज कुमार तिवारी

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