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फिल्मों में महिलाएं

विद्या बालन की द डर्टी पिक्चर की कामयाबी का यह असर हुआ है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में महिला प्रधान फिल्मों की संभावना तलाशी जाने लगी है। निर्माताओं को लगने लगा है कि अगर हीरोइनों को सेंट्रल रोल देकर फिल्में बनाई जाएं, तो उन्हें देखने दर्शक आ सकते हैं। महिला प्रधान फिल्मों की हमारी सामान्य धारणा हिंदी फिल्मों से बनी हुई है। अगर किसी फिल्म में महिला किरदार थोड़ा मजबूत और स्वतंत्र दिखे, तो हम उसे महिला प्रधान फिल्म की संज्ञा दे देते हैं।

पैरेलल सिनेमा के दौर में इसी आधार पर हम मानते रहे कि महिला प्रधान फिल्में बन रही हैं। कुछ महिला निर्देशकों की फिल्में नारी अस्मिता के सवालों को उठाती नजर भी आईं, पर कमर्शियल सिनेमा ने सभी को निगल लिया। फिल्मों में महिलाओं को फिर से नाचने-गाने या शो पीस की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। हीरो-हीरोइन के महत्व, सम्मान और पारिश्रमिक में अंतर हिंदी फिल्मों की शुरुआत से चला आ रहा है। समाज के दूसरे क्षेत्रों में कार्य और पारिश्रमिक के अनुपात में एक समानता-सी दिखती है, लेकिन हिंदी फिल्मों में ऐसी समानता अब भी एक सपना है।

हिंदी फिल्मों के लिए एक दुर्भाग्य की बात यह है कि गंभीर और उम्दा अभिनेत्रियों को अधिक काम नहीं मिलते। अगर किसी ने अपनी दक्षता साबित कर दी, तो उसे दरकिनार कर दिया जाता है। शबाना आजमी, तब्बू, विद्या बालन जैसे अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं। इन्होंने अपनी योग्यता साबित की है। इसके बावजूद इन अभिनेत्रियों को पर्याप्त मौके नहीं मिलते।
चवन्नी चैप में अजय ब्रह्मात्मज

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