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रंगों का मौसम

इस बार होली भारत के सबसे लोकप्रिय आधुनिक त्योहार यानी चुनावों के ठीक बाद आई है। कुछ पार्टियां और कुछ नेता इस होली का जमकर मजा लूटेंगे और कुछ के लिए यह आत्मविश्लेषण और सिंहावलोकन का वक्त होगा। भारतीय आमतौर पर उत्सवप्रिय लोग हैं और कम से कम होली व दिवाली ऐसे त्योहार हैं, जो किसी भी माहौल में खूब जोर-शोर से मनाए जाते हैं। इसी तरह चुनावों को भी भारतीयों ने रंग-बिरंगे उत्सव में बदल दिया है।

इन चुनावों के नतीजे कुछ पार्टियों के लिए खासकर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के लिए बुरे हैं, लेकिन यह उत्साहजनक तथ्य है कि भारतीय लोकतंत्र को ये नतीजे मजबूती देते हैं और उसकी बढ़ती परिपक्वता का भी संकेत देते हैं। पिछले कई चुनावों के नतीजे ये बताते हैं कि भारतीय वोटर अब भी जाति-धर्म वगैरह से जुड़ा तो हुआ है, लेकिन वह वोट देने में आंख बंद करके इन्हीं पैमानों का इस्तेमाल नहीं करता, वह उम्मीदवारों और पार्टियों के बेहतर कामकाज को तरजीह देता है।

पिछले कई चुनावों से ‘एंटी इनकंबेंसी’ का मिथ भी टूटा है कि जनता सत्तारूढ़ पार्टी को जरूर हटाती है और विपक्षी ताकतों की थाली में सत्ता परोस देती है। इस बार पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन का फिर से सत्ता में आना इस मिथ को तोड़ता है। इस होली को धूमधाम से इसलिए भी मनाना चाहिए कि भारतीय राजनीति व अर्थव्यवस्था के ‘फंडामेंटल्स’ मजबूत हैं और अगर कुछ झटके लगते भी हैं, तो उनसे उबरना तयशुदा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर गिरकर छह प्रतिशत तक आ गई है, लेकिन यह माना जा सकता है कि यह गिरावट की सीमा है, इसके बाद विकास दर बढ़ेगी ही।

इस साल मानसून अच्छा हुआ है और होली के आसपास आने वाली रबी की फसल में रिकॉर्ड उत्पादन होगा, यह उम्मीद की जा सकती है। महंगाई बढ़ने की दर भी काफी नीची हुई है और ब्याज दरें घटने की भी भरपूर संभावना है। इससे अर्थव्यवस्था को रफ्तार पकड़ने का एक मौका मिलेगा। राजनीति के बदले स्वरूप की वजह से देश के पिछड़े राज्य भी तेजी से विकास कर रहे हैं। बिहार और ओडिशा अब पिछड़ेपन के उदाहरण नहीं रहे, बल्कि तेज रफ्तार विकास के मॉडल बन गए हैं।

उत्तर प्रदेश में बसपा के राज्य में भ्रष्टाचार और दूसरे मुद्दों की वजह से मायावती सरकार भले ही हार गई हो, लेकिन इस दौरान राज्य में आर्थिक विकास की दर सात प्रतिशत के आसपास रही है। अगर समाजवादी पार्टी अपने चुनावी वायदों पर कायम रहती है, तो आने वाले वक्त में उत्तर प्रदेश भी विकास और सुशासन का उदाहरण बन सकेगा।

होली का त्योहार जिस मौसम में यानी वसंत में आता है, उसकी एक खासियत है। दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में पतझड़ और वसंत दो अलग-अलग मौसम हैं, लेकिन भारत के ज्यादातर हिस्सों में जिस मौसम में पत्ते झड़ते हैं, उसी के दौरान नई पत्तियां और फूल भी आते हैं, इसलिए कुछेक इलाकों या पेड़ों की प्रजातियों को छोड़कर कभी नंगे पेड़ नहीं दिखते। यही भारतीय संस्कृति और समाज की भी खासियत है, उसमें रंग और हरियाली हर वक्त मौजूद रहती है, पतझड़ के दौरान भी। होली ऐसा त्योहार है, जो हमें भारतीय समाज की इसी विशेषता को दिखाता है, साथ ही हमारी संस्कृति के अनेक रंगों का प्रतिनिधित्व भी उसमें होता है।

लोकतंत्र अभी तक के मानव इतिहास की सबसे विकसित शासन व्यवस्था है। यह बात क्या अनोखी नहीं है कि स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत ने इस व्यवस्था को अपना लिया, सफलता से चलाया और साथ ही अपने रंग में भी रंग दिया। इस रंगीनी और मौलिकता का उत्सव मनाने का मौका है होली और इसीलिए इसमें पूरा देश हर बार पूरे उत्साह के साथ शामिल होता है।

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