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हाशिये पर आधी आबादी

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। पिछले दस वर्षों में सियासी व सामाजिक हलकों में औरतों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। जाहिर है, तालिबान युग की तुलना में खातूनों की तकदीर काफी सुधरी है। लेकिन आधी आबादी से जुड़े हुकूमत के वायदे अभी पूरे नहीं हुए हैं। मुल्क में औरतों के साथ खूनी वारदातें बदस्तूर जारी हैं। उनसे भेदभाव बरतने का रिवाज अब भी कायम है। मसलन, कुंदुज में एक औरत का कत्ल सिर्फ इसलिए कर दिया गया कि उसने बेटी को जन्म दिया था और ससुराल वाले चाहते थे कि बेटा हो। एक और मामले को लीजिए।

बीते शुक्रवार को पंद्रह साल की एक बीवी ने घरेलू हिंसा से छुटकारा पाने के लिए खुद को आग के हवाले कर दिया। उसकी जबरन शादी हुई थी और ससुराल वाले काफी तंग कर रहे थे। बदकिस्मती यह भी है कि महिला दिवस से ठीक पहले, उलेमा कौंसिल ऑफ अफगानिस्तान ने एक फरमान सुनाया है कि कामकाजी हलकों व तालीम सेंटरों में मर्दों व औरतों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हों। मजहबी जानकारों का कहना है कि औरतें बिना मर्दों को साथ लिए घर से बाहर न निकलें।

इस बयान के मुताबिक, मर्द बुनियाद है और औरत एक ढांचा। यानी मर्द श्रेष्ठ है और औरत तुच्छ। यह तो कुदरत के बराबरी के उसूल की नाफरमानी है। फिर भी इस तरह की तकरीरों को समाज में बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पहले इनफॉर्मेशन ऐंड कल्चर मिनिस्ट्री की ओर से कहा गया था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खबर पढ़ने वाली औरतें टीवी पर दिखते वक्त इस्लामी रवायतों और तहजीबों का पूरा खयाल रखें।

एक नोटिस जारी करते हुए मंत्रालय ने सभी चैनलों को हुक्म सुनाया कि न्यूज पेश करने वाली औरतें अपने माथे को ढककर खबर पढ़ें और ‘थिक मेक-अप’ से परहेज करें। खबरनवीसों, सिविल सोसायटी से जुड़े संगठनों व औरतों के हकों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं ने इसकी पुरजोर मजम्मत की है। बहरहाल, ऐसे मसले चिंता बढ़ाते हैं। कहीं तालिबानी संकीर्णताओं और उसके बताए शरिया कानूनों को फिर से बहाल करने की कोशिश तो नहीं हो रही है। हो सकता है कि दहशतगर्दों को पटाने के लिए ये सब किए जा रहे हों।
डेली आउटलुक, अफगानिस्तान

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