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बुरा न मानो होली है

आज के दिन हम रंग, गुलाल और अबीर में इस तरह रंगते हैं कि सभी सामाजिक व आर्थिक विषमताओं को भूल जाते हैं। यकीनन, यह पर्व हमारी एकता का द्योतक है। आपसी बैर-भाव भूलकर हम एक-दूसरे को गले लगाते हैं और कह उठते हैं, बुरा न मानो होली है। यह सिलसिला सदियों से यूं ही चलता आया है। परंतु हमारे बीच कुछ ऐसे सिरफिरे लोग भी हैं, जो इस त्योहार की पवित्रता को धूमिल करने पर आमादा हैं। वे नशा करते हैं, फिर सड़क पर हो-हल्ला मचाते हैं। यहां तक कि वे मार-पीट करने और महिलाओं पर अश्लील फब्तियां कसने से भी बाज नहीं आते। आखिर ऐसे में कोई कैसे बुरा न माने। तो आइए इस होली पर हम यह प्रण लें कि रंगों के इस त्योहार को सामाजिक सद्भाव दिवस के तौर पर मनाएंगे, न कि दूसरों की भावनाओं को आहत करने के रूप में।
मोती लाल जैन, 99, सूर्या निकेतन, दिल्ली

मैली होती गंगा
गंगा नदी हिन्दुस्तान की अलौकिक शोभा है। प्राचीन काल से ही यह भारत भूमि को स्वर्ग का दर्जा दिलाती रही है। यहीं नहीं, हमारी सभ्यता-संस्कृति का भी यह पोषण करती है। बड़े-बड़े महापुरुषों ने गंगा की महिमा का अपने-अपने तरीके से वर्णन किया है। गंगोत्री से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा नाना प्रकार के नामों से बुलाई जाती रही है। फिर भी, उसके पानी की शीतलता घटती नहीं। परंतु, पिछले कुछ वर्षों में हमने औद्योगिक तरक्की के नाम पर गंगा का जबर्दस्त दोहन किया है। कभी इसकी धारा को मोड़ने का दुस्साहस किया, तो कभी इसमें कूड़े-कचड़े डालने की जुर्रत भी की। इन सबके कारण हमारी गंगा मैली हो गई है। इसे प्रदूषण रहित बनाने की कोशिशें तेज होनी चाहिए।
राजेश वधवा, पहाड़गंज, नई दिल्ली
rajeshwadhwa2000@gmail.com

रंग में भंग न पड़े
विज्ञान कहता है कि जितने भी शरीर को जख्म मिलते हैं, उनमें जीभ पर लगे जख्म सबसे पहले भरते हैं। परंतु अध्यात्म कहता है कि जीभ से मिले जख्म कभी भरते ही नहीं। जीभ से निकले शब्द दो शत्रुओं का मेल भी करा सकते हैं और किन्हीं दो मित्रों को शत्रु भी बना सकते हैं। होली के अवसर पर लोग आपस में रंग डालते समय एक-दूसरे पर कभी-कभार ऐसे कटु वचन बोलते हैं, जिससे होली के रंग में भंग पड़ जाता है। अत: जहां इतने गम पहले से ही हैं और दो वक्त की रोटी कमाने में अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती है, वहां अगर दो बोल मीठे ही बोल दें, तो सुनने वाले के दिल को ठंडक मिल जाती है। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि आप जैसा दूसरों से बर्ताव करेंगे, वैसा ही व्यवहार दूसरों से पाएंगे। यदि इस सूत्र वाक्य को हम याद रखें, तो काफी सारा टंटा यों ही खत्म हो जाएगा।
मनोज दुबलिश
drmanojdublish@gmail.com

भूकंप से बचाव
हमारे देश में समय-समय पर भूचाल आते ही रहते हैं। विगत वर्षों में इससे जान-माल का नुकसान भी हुआ है। दूसरी तरफ, देश के अंदर निर्माण-कार्यो में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में, भूकंप आने से तबाही की आशंका और बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और आर्किटेक्ट से जुड़े लोगों की अब जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वे ऐसे तरीके खोज निकालें और ऐसे निर्माण कार्य हों, जिन पर भूकंप का प्रभाव कम से कम पड़े। हाल ही में ईरानी वैज्ञानिकों ने अल्ट्रा-हाई परफॉरमेंस कंक्रीट विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। यह कंक्रीट भूकंप के तीव्र झटकों को सहन कर सकता है। ईरान अपने परमाणु संयंत्रों के निर्माण में इसी कंक्रीट का प्रयोग कर रहा है। भारत को भी यह क्रंकीट विकसित करना चाहिए।
नवीनचंद्र तिवारी
tewari.navinchandra@gmail.com

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