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वर्टिगो जो सिर चकराए तो तुरंत चेत जाएं

वर्टिगो जो सिर चकराए तो तुरंत चेत जाएं

सिर दर्द, चक्कर, नॉज़िया- ये वर्टिगो के लक्षण हैं। दिल्ली में तेजी से पैर पसार रही इस बीमारी के रोगियों का किचन में काम करना, सीढ़ियों का इस्तेमाल, अंधेरे में आने-जाने व ड्राइविंग के साथ हैवी मशीनों पर काम करना खतरनाक हो सकता है। मैक्स हॉस्पिटल के ईएनटी एक्सपर्ट डॉ. अतुल मित्तल से वर्टिगो की पहचान, इलाज को लेकर बात की प्रीति सेठ ने

राजधानी में कामकाजी लोगों का गाहे-बगाहे सिर घूमने और चकराने की परेशानी से साबका होता ही रहता है। दस में से चार लोग इसे हल्के में लेते हैं। सुबह कुछ खाया नहीं था, रात उल्टा-सीधा खा लिया था, रात नींद पूरी नहीं हुई थी- जैसी दलीलें देकर खुद को समझा लेते हैं। जबकि हो सकता है कि सिर का बार-बार चकराना, सिर में दर्द का बना रहना वर्टिगो हो। वर्टिगो लैटिन का शब्द है, जिसका अर्थ है चक्कर आना। दरअसल इसमें यह एहसास होता है कि सब कुछ घूम रहा है। आप स्थिर हैं लेकिन कुछ सेकेंड के लिए वातावरण चक्कर लगाने लगता है। खास बात यह कि आड़ा या तिरछा देखने पर इसमें सब घूमता दिखाई देता है। कभी-कभी चक्कर के साथ उल्टी जैसा भी महसूस होता है। वैसे तो चार से छह दिन में यह अपने आप भी ठीक हो जाता है, लेकिन कभी-कभी इसके लिए एक्सपर्ट सलाह की भी आवश्यकता होती है।

सामान्यतया वायरल इन्फेक्शन से हमारे इनर कान में रेस्पिरेटरी ट्रैक इंफेक्शन के कारण होने वाली परेशानी को वर्टिगो कहते हैं। यह ब्रेन में भी हो सकता है और कान के भीतर भी। वर्टिगो कई तरह का है।

बिनायन पैरॉक्सीस्मॉल पोजिशनल वर्टिगो (बीपीपीवी)
बीपीपीवी का मुख्य कारण नहीं मालूम। लेकिन ये बेहद कॉमन व संक्षिप्त पीरियड का वर्टिगो है। नॉर्मली एक मिनट से भी कम। इनर ईयर की मैलफंक्शन के खराब होने पर यह होता है। ये सीवियर नहीं होते। इसमें कानों में घंटी की सी आवाज सुनाई देती है। लंबा चलने पर इसमें हीयरिंग लॉस भी हो सकता है। इसलिए इसमें दी जाने वाली दवाइयां देर तक चलती हैं। इन्हें बिना सलाह के बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसके दोबारा होने की आशंका बनी ही रहती है।

मिनियर डिसीज
यह वर्टिगो का तीसरा प्रकार है। ज्यादातर युवाओं को होता है। सीवियर नॉजिया और उल्टी आने के साथ घंटियां कान में सुनाई देती हैं और कान में दबाव महसूस होता है। ज्यादा होने पर सुनने में दिक्कत हो सकती है। कान के अंदर मौजूद फ्लुएड जब ज्यादा होता जाता है, तो ईयर बैलेंस गड़बड़ा जाने पर ऐसा होता है। गंभीर होने पर कई बार सर्जरी की नौबत भी आ जाती है। इसके इलाज के लिए एंटी वर्टिगो मेडिसिन लेनी पड़ती हैं। जिस मूवमेंट से परेशानी होती है, उसे करने से बचें। कई बार दवाओं के साथ बेड रेस्ट (पूर्ण विश्रम) की सलाह भी दी जाती है। इंफेक्शन को दूर करने के लिए एंटीबायटिक दवाएं भी दी जा सकती हैं।

रिकरेंट वैस्टीबुलोपैथी
इसके लक्षण मिनियर डिसीज से मिलते-जुलते हैं। यह अपने आप होता है और स्वयं ठीक भी हो जाता है। लेकिन कई बार मिनियर डिसीज में परिवर्तित हो जाता है। मस्तिष्क से इसका लेना-देना नहीं है। इसका इलाज मिनियर डिसीज की तरह होता है। लाइफस्टाइल में बदलाव लाकर इसे ठीक किया जा सकता है।

वायरल लेबिरिनथाइटिस
मस्तिष्क और कानों के तार जुड़े होते हैं नर्व्स के जरिये। कॉकलियर नव्र्स आवाज और शब्द सुन कर सूचना भेजने का काम करती हैं और वेस्टबुलर नर्व्स उस संदेश के अनुसार शारीरिक स्थिति को बैलेंस करती है। वायरल इंफेक्शन के कारण यदि इन दोनों ही नव्र्स में से किसी का भी बैलेंस गड़बड़ हो जाता है तो वर्टिगो की स्थिति पैदा हो जाती है।

वेस्टीबुलर न्यूरोनिटिस
वेस्टाबुलर नर्व में सूजन के कारण ऐसा होता है। इससे वेस्टाबुलर नर्व्स जो संदेश ब्रेन को देती हैं वे गड़बड़ा जाती हैं। इसमें हीयरिंग लॉस नहीं होता, न ही कानों में सुगबुगाहट और घंटियां सुनाई देती हैं।

डरने की जरूरत नहीं
डॉक्टर को मरीज के लक्षण और परेशानी समझ कर ही आगे इलाज करता है। सामान्यतया शुगर लेवल की जांच के लिए कुछ ब्लड टेस्ट कराए जाते हैं। ईसीजी कराकर हार्ट की स्थिति जानी जाती है। यदि समस्या ब्रेन में है तो कैटस्कैन और एमआरआई कराने की सलाह दी जाती है।

सजग रहें, सतर्क रहें
योग और नियमित व्यायाम से काफी हद तक वर्टिगो को नियंत्रित किया जा सकता है। यह युवा और छोटे बच्चों को भी हो सकता है। यदि दो या तीन दिन से ज्यादा समय तक चक्कर और नॉजिया की फीलिंग के साथ असहजता लग रही हो तो अनदेखी न करें, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

हर चक्कर वर्टिगो नहीं है
1. कई बार प्रेग्नेंसी में भी चक्कर और नॉज़िया की फीलिंग।
2. ब्रेन की ज्यादातर परेशानियों के भी यही लक्षण होते हैं।
3. नींद पूरी न होने पर भी कई बार चक्कर और नॉज़िया महसूस होता है।
4. ब्लड प्रेशर में भी खून की सप्लाई असुतंलित होने पर ऐसा हो सकता है।
5. डाइबिटीज वालों की आर्टिज़ ठोस होने पर भी ब्रेन में खून की सप्लाई बाधित होने पर चक्कर आ सकते हैं।
6. एनीमिया
7. हाई कोलेस्ट्रॉल
8.  कैल्शियम डिसऑर्डर
9. नशे की लत
10. केमिकल चेंजेज या मेटाबॉलिज्म की समस्याएं या हार्मोनल बदलाव

ऐसे में सावधान हो जाएं

आस-पास घूमता दिखने या चक्कर आने पर
नॉज़िया और उल्टी होने पर
कानों में घंटियां-सी सुनाई देने पर
कान में दर्द हो
आंखों से धुंधला दिखे या असंतुलित आई मूवमेंट होने लगे
चलने में दिक्कत आने लगे, सिर हल्का लगने लगे
देर तक खड़े रहने में परेशानी हो

‘साधारण तौर पर एक से दो महीने में एक बार चक्कर आने को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दो से तीन प्रतिशत मामलों में चक्कर दिमाग में टय़ूमर की वजह से भी हो सकता है। इसलिए सही समय पर जांच करानी चाहिए। जबकि वर्टिगो में अक्सर यह देखा जाता है कि मरीज शुरुआती तकलीफ को नजरअंदाज करता है। पढ़ाई करने वाले या फिर कंप्यूटर पर काम करने वाले लोगों को इसकी समस्या रेडिएशन की वजह से भी हो सकती है। इसलिए काम करने की स्थिति और समय को बदलते रहना चाहिए,जबकि नियमित मेडिटेशन और आहार से भी चक्कर को नियंत्रित किया जा सकता है।’
-डॉ. ए.के. महापात्र, न्यूरोलॉजिस्ट, एम्स

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