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म्यूरल की रंगीन दुनिया

म्यूरल की रंगीन दुनिया

दीवारों पर बनी बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स का नाम है म्यूरल आर्ट। देखने में खूबसूरत और संदेश देती इस कला में आप भी अपना भविष्य संवार सकते हैं। कैसे, बता रहे हैं शैलेन्द्र सिंह नेगी

क्या आपने कभी रेलवे स्टेशनों, मंदिरों और हवाई अड्डों की दीवारों पर बनी बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स को गौर से देखा है। उन्हें देख कर ऐसा लगता है मानो वे चीजें हमारे सामने ही हों, जबकि ऐसा होता नहीं। यह कोई सामान्य पेंटिंग नहीं होती, बल्कि यह म्यूरल कहलाते हैं, जिसमें कलाकार रंगों की अद्भुत मिलावट से एक जीवंत चित्र खींच देते हैं।

म्यूरल मतलब रंगों की मदद से दीवारों पर उकेरे गए ऐसे चित्र, जो बिल्कुल जीवंत लगते हैं। यह कला भारतीयों के लिए नयी नहीं है, लेकिन मॉडर्न आर्ट ने इसे लोकप्रिय बनाने में खूब मदद की है। म्यूरल्स हमारे लिए इसलिए भी खास हैं, क्योंकि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने में भी ये मददगार साबित हुए थे। भित्ति चित्रों के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुंचाना भारतीय संस्कृति की पुरानी पहचान रही है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में खंडहरनुमा महलों में आज भी ऐतिहासिक म्यूरल्स देखे जा सकते हैं। पहले इस काम को कुछ खास जातियां या परिवार किया करते थे, लेकिन अब ये प्रोफेशनल काम बन चुका है। कोई भी सामान्य व्यक्ति, जिसे कला और रंगों की थोड़ी-सी समझ हो, वह म्यूरल मेकिंग में हाथ आजमा सकता है।

म्यूरल्स की खासियत
आमतौर पर इसे दीवारों पर बनाई गई पेंटिंग के रूप में समझा जाता है। दीवारों पर पेंटिंग बनाने से हट कर सोचने व क्रियान्वित करने के ट्रेंड ने इसे बहुआयामी बना दिया है। अब टाइल्स, टेराकोटा, सीमेंट, बालू, ग्लास, प्लास्टिक, लोहे और स्टील आदि माध्यमों से परमानेंट म्यूरल बनाए जाते हैं।

किस-किस तरह के म्यूरल
ट्रेडिशनल म्यूरल: जैसे कोई प्राकृतिक सीनरी, नदियां, झरने आदि। अक्सर इस तरह के म्यूरल स्विमिंग पूल या मंदिरों की दीवारों पर बनाए जाते हैं।
कॉरपोरेट म्यूरल: इस तरह के म्यूरल कंपनियों या कॉरपोरेट दफ्तरों के अंदर बनवाए जाते हैं।
टाइल म्यूरल: इस तरह के म्यूरल घरों की दीवारों पर बनाए जाते हैं। इनमें रंगों के साथ अन्य चीजों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
राजनीतिक म्यूरल्स: इस तरह के म्यूरल्स में किसी राजनीतिक दल या राजनेता के राजनीतिक सफर के बारे में बताया जाता है।
ऐतिहासिक म्यूरल्स: ऐसे म्यूरल्स के माध्यम से देश, दुनिया या किसी संस्था के इतिहास को दर्शाया जाता है।

कितना खर्च
अगर एक सामान्य आर्टिस्ट म्यूरल मेकिंग में करियर बनाना चाहता है तो इसके लिए शुरुआती खर्च एक से तीन लाख के बीच आता है। इसके लिए राज्य सरकार का कला और संस्कृति विभाग कलाकारों के लिए प्रोत्साहन राशि की घोषणा करता रहता है।

कितना बड़ा बाजार
घर या कंपनी में म्यूरल बनवाना एक स्टेटस सिम्बल बन चुका है। म्यूरल भारत में उभरता हुआ काम है। मेट्रो से लेकर बड़े-बड़े मॉल्स में म्यूरल्स बनवाए जा रहे हैं।

वर्कशॉप से बढ़ाएं स्किल
म्यूरल मेकिंग के लिए देश भर में फैले कला विद्यालय समय-समय पर कई तरह की वर्कशॉप करवाते रहते हैं, जिनमें इस क्षेत्र के एक्सपर्ट आते हैं। इनमें हिस्सा लेकर आप अपनी कला को और निखार सकते हैं।

किस तरह के लोग इस क्षेत्र में आएं
अगर आप क्रिएटिव हैं और जो आप सोचते हैं, उसमें रंग भरने की क्षमता आपके अंदर है तो आप म्यूरल मेकिंग के क्षेत्र में आ सकते हैं। साथ ही इस फील्ड में सफलता के लिए सब्र का होना भी आवश्यक है।

म्यूरल्स बनाने वाले के व्यक्तिगत गुण

रचनात्मकता
अलग तरह से सोचने की क्षमता
कुछ अलग करने की लगन
रंगों की समझ
पढ़ने-लिखने में मन लगता हो
अपने आस-पास जो कुछ हो रहा है, उसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पहलू समझने की क्षमता

फैक्ट फाइल

कमाई की संभावनाएं
कला क्षेत्र में पैसे की कोई कमी नहीं है, लेकिन आपकी लोकप्रियता मार्केट तय करती है। आजकल आर्ट गैलरीज में भी रोजगार की भरपूर संभावनाएं हैं। आमतौर पर एक म्यूरल बनाने के एक से पांच लाख रुपये के बीच आसानी से मिल जाते हैं।

किस-किस तरह के कोर्स
म्यूरल मेकिंग में कोई स्पेशलाइज्ड कोर्स उपलब्ध नहीं है, लेकिन पढ़ाई के दौरान आप स्पेशलाइजेशन कर सकते हैं। आमतौर पर सभी संस्थानों में यह चार वर्षीय कोर्स उपलब्ध है। वहीं कुछ संस्थानों में बीए इन आर्ट जैसे ट्रेडिशनल कोर्स भी चल रहे हैं। प्रथम वर्ष में संस्थान में विजुअल आर्ट्स के सभी पाठय़क्रम पढ़ाए जाते हैं, जिसे फाउंडेशन कोर्स कहा जाता है। इसके बाद प्राप्तांक व मेरिट के आधार पर तीन साल का स्पेशलाइजेशन कोर्स करना होता है। इसे बैचलर इन फाइन आर्ट्स या बैचलर इन विजुअल आर्ट्स कहते हैं। आपको और एडवांस चीजें सीखनी हों तो पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स, यानी मास्टर इन फाइन आर्ट्स या मास्टर इन विजुअल आर्ट्स कर सकते हैं। बाद में पीएचडी भी कर सकते हैं।

रोजगार की संभावना
बीएफए या बीवीए करने के बाद स्कूल स्तर पर शिक्षक, सरकारी संस्थानों में कलाकार बन सकते हैं, लेकिन यह केवल ट्रेडिशनल रोजगार है। इसके अलावा इसका क्रिएटिव पहलू स्वतंत्र कलाकार बनने का भी है। इसके अलावा विज्ञापन संस्थानों,आर्ट गैलरीज, प्रकाशन क्षेत्र और एनिमेशन फिल्मों में भी रोजगार की अपार संभावनाएं हैं।

शैक्षिक योग्यता
हालांकि यह एक क्रिएटिव फील्ड है, इसलिए यहां डिग्री उतनी मायने नहीं रखती, लेकिन अगर आप प्रोफेशनल आर्टिस्ट्स वर्ल्ड में बने रहना चाहते हैं तो इसके लिए कोर्स करना जरूरी है। आर्ट से संबंधित किसी भी बेसिक कोर्स को करने के लिए कला विषय के साथ बारहवीं होना आवश्यक है। अगर आप पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहते हैं तो इसके लिए बीएफए, बीवीए या बीए इन आर्ट की डिग्री होना आवश्यक है।

संस्थान

सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
कॉलेज ऑफ आर्ट, चंडीगढ़
दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट, दिल्ली
फैकल्टी ऑफ विजुअल आर्ट, बीएचयू, बनारस
कुमाऊं यूनिवर्सिटी, नैनीताल, उत्तराखंड 

सक्सेस स्टोरी
काम के प्रति दीवानगी जरूरी
सुरेन्द्र पाल जोशी,चित्रकार

राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित सुरेन्द्र पाल जोशी कला क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है। सुरेन्द्र पाल का जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गांव मनिहारा वाला में 1958 में हुआ। शुरुआती शिक्षा गांव व देहरादून में लेने के बाद फाइन आर्ट में डिग्री लखनऊ से प्राप्त की। सबसे पहले उन्होंने जयपुर के प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र में आर्टिस्ट के पद पर नौकरी की, उसके बाद वे जयपुर के महाराजा कॉलेज ऑफ आर्ट्स में बतौर लेक्चरर नियुक्त हुए और सन् 2008 तक प्रोफेसर पद पर रहे। सुरेन्द्र पाल कहते हैं कि काम के प्रति दीवानगी के हिसाब से ही सफलता तय होती है, जगह से नहीं। जितना जुनून, उतनी सफलता। सुरेन्द्र पाल जोशी मूलत: चित्रकार हैं, लेकिन म्यूरल्स और स्कल्पचर पर भी उनका पूरा अधिकार है। इन दोनों विधाओं के बीच तालमेल के सवाल पर सुरेन्द्र कहते हैं कि विधा में बदलाव जोखिमपूर्ण जरूर है, किन्तु यदि इसे चुनौती मानते हुए पूरा अभ्यास किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है। जोशी चित्रकला को वरीयता देते हैं, किन्तु म्यूरल्स को भी उसी तन्मयता के साथ तैयार करते हैं। देश-विदेश में अपनी दो दर्जन से अधिक एकल कला प्रदर्शनी लगा चुके सुरेन्द्र पाल जोशी ने कहा कि अपनी कलायात्रा के शुरुआती दौर में वह केवल गाय-भैंसों के स्कैच बनाया करते थे, यही स्कैच बनाते-बनाते वो कब चित्रकार बन गए, उन्हें पता ही नहीं चला।

एक्सपर्ट व्यू
भारत में म्यूरल की जबरदस्त संभावनाएं
शाह अबुल फैज
असिस्टेंट प्रोफेसर, पेंटिंग डिपार्टमेंट,जामिया मिल्लिया इस्लामिया

इन दिनों पूरी दुनिया में नई सोच है। जिसके पास प्रतिभा है, उसकी तरक्की की कोई सीमा नहीं होती। विजुअल आर्ट भी एक ऐसा ही क्षेत्र है। अगर आप अपनी आर्टिस्टिक इंस्टिंक्ट को तरजीह देते हैं तो विजुअल आर्ट आपके लिए बेहतर करियर ऑप्शन बन सकता है। जहां तक म्यूरल्स का सवाल है, यह पेंटिंग का ही हिस्सा है। देखा गया है कि इन दिनों लोगों की रुचि आर्ट वर्क की तरफ बढ़ी है, इसलिए आर्टिस्टों की बाजार मांग भी बढ़ी है। आमतौर पर पहले म्यूरल्स आर्ट का होटलों में इस्तेमाल होता था, लेकिन अब सरकारी इमारतों में भी म्यूरल्स का खूब इस्तेमाल हो रहा है। अक्‍सर म्यूरल्स का उपयोग कोई संदेश देने के लिए किया जाता है, इसलिए म्यूरल बनाने वाले आर्टिस्ट के अंदर सामाजिक समझ और संवेदनशीलता का होना आवश्यक है। वैसे म्यूरल्स दूर से देखी जाने वाली कला है, इसलिए इसे बनाते समय आर्टिस्ट को म्यूरल के उद्देश्य के बारे में अच्छी तरह से पता होना चाहिए, तभी एक आर्टिस्ट दीवार पर अपने फाइन कलर कॉम्बिनेशन और सोच के मिश्रण से किसी चीज को मूर्त रूप दे सकता है। म्यूरल की रचना के समय विषय के साथ सही कलर कॉम्बिनेशन होना जरुरी है़, क्योंकि हर रंग अपने आप में कुछ संदेश छोड़ता है। आमतौर पर एक म्यूरल की रचना टाइल्स, सीमेंट, मेटल और एक्रेलिक रंगों से होती है। आज भारत में पेंटिंग का जबर्दस्त स्कोप है। जरूरत संभावनाएं तलाशने की है।

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