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लाइफस्टाइल कर रही किडनी फेल

आज की जीवनशैली में बीमारियां तो आम होती जा रही हैं। खासकर दिल्ली में तरह-तरह की समस्याएं सामने आती रहती हैं। लेकिन किडनी की समस्या काफी गंभीर होती है। किडनी फेल्योर तो जानलेवा साबित होता है। सविता गर्ग बता रही हैं कि आप कैसे थोड़ी सावधानी बरतकर इस बड़ी समस्या से दूर रह सकते हैं।

भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में किडनी यानी गुर्दे की बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ती जा रही हैं। किडनी की बीमारियों को लेकर ही लोगों को जागरूक करने के लिए ही इस माह को राष्ट्रीय किडनी माह के रूप में मनाया जा रहा है। वास्तव में किडनी की बीमारियों के बारे में आम लोगों को जागरूक करने की जरूरत इसलिए भी अधिक महसूस की जा रही है, क्योंकि भारत में ही हर दस में से एक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में क्रोनिक किडनी की बीमारी की आशंका होती है। हर साल भारत में लगभग डेढ़ लाख व्यक्ति किडनी फेल्योर की अंतिम अवस्था के साथ मरीज बनकर सामने आ रहे हैं। आइए, इस विशेष माह में जानें किडनी, उसकी बीमारियों और  बचाव के बारे में।

क्या हैं किडनी के कार्य
चिकित्सकों के अनुसार, किडनी हमारी बॉडी में खून में से विषैले पदार्थों और अनावश्यक पानी को निकालकर उसे साफ-सुथरा रखती है। इसके अलावा रक्तचाप नियंत्रण, सोडियम व पोटेशियम की मात्र में नियंत्रण और रक्त की अम्लीयता में नियंत्रण किडनी द्वारा किये जाने वाले अहम कार्य हैं। जब किडनी हमारी बॉडी में एकत्रित हुई गंदगी को हटाने में अक्षम हो जाती है तो उसे किडनी फेल्योर कहा जाता है। डॉक्टरी भाषा में रक्त जांच में यूरिया और क्रियेटिनीन नामक पदार्थ की बढ़ी हुई मात्र किडनी फेल्योर को दर्शाती है। धीरे-धीरे एवं स्थायी रूप से किडनी की कार्यक्षमता, जो आमतौर पर कई महीनों या सालों में घटती जाती है, को क्रोनिक किडनी फेल्योर कहा जाता है।

किडनी की बीमारियों के लक्षण

चेहरे पर, आंखों के चारों ओर सूजन आना (ये सूजन सुबह ज्यादा दिखाई पड़ती है) और पैरों में सूजन आना।

भूख कम लगना, मितली आना, चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना, हर समय थकान महसूस करना, बॉडी में रक्त की कमी होना।

कम उम्र में हाई ब्लडप्रेशर होना या अनियंत्रित हाई ब्लडप्रेशर होना।

कमर में नीचे पसलियों में दर्द होना।

यदि आप किसी भी ऐसे लक्षण को महसूस कर रहे हैं तो तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लीजिए और पूरी जांच कराइये।

क्यों होती है समस्या
मधुमेह और उच्च रक्तचाप किडनी की स्थायी समस्याओं के मुख्य कारण माने जाते हैं। इसके अलावा और भी कई ऐसी चीजें हैं, जो किडनी की खराबी की वजह बन सकती हैं। इनमें आधुनिक जीवनशैली, शारीरिक श्रम का अभाव, असंयमित खानपान, बढ़ता तनाव, धूम्रपान, मोटापा, दर्द निवारक दवाओं का अधिक सेवन, व्यायाम न करना और जंक फूड का इस्तेमाल किडनी की समस्या के कारण हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि लगातार टीवी और कंप्यूटर से चिपके रहने के कारण शारीरिक व्यायाम कम हो जाता है, जिस कारण मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी दिक्कतें बढ़ रही हैं और युवा अवस्था में ही किडनी फेल्योर का सामना करना पड़ रहा है।

उपचार
एम्स (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस) में नेफ्रोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉं एस सी डैश का मानना है कि यदि प्रारंभ से ही संयमित जीवनशैली अपनायी जाए तो किडनी की बीमारियों से बचा जा सकता है। वह बताते हैं, जागरूकता के अभाव में ऐसा नहीं हो पा रहा है। दूसरी बात कि किडनी की बीमारियों के शुरुआती लक्षण सामने नहीं आ पाते, जिसकी वजह से ज्यादातर लोग इस बीमारी की अंतिम अवस्था में ही अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। डॉं  डैश का मानना है कि भारत जैसे विकासशील देश में किडनी की बीमारियों के इलाज से ज्यादा इस बीमारी की रोकथाम पर जोर देना चाहिए। इसके लिए स्कूली स्तर पर ही बच्चों को जागरूक करना चाहिए, तभी इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है।

किडनी फेल्योर से बचने के उपाय

संतुलित और पौष्टिक खानपान लें और जंकफूड से परहेज करें।
नियमित दिनचर्या में व्यायाम को शामिल करें। इसके साथ ही योग करें और रोजाना कम से कम 1 घंटा ताजा हवा में टहलें।
तनाव मुक्त रहें और रोजाना पूरी नींद लें।
अपना वजन नियंत्रित रखें। यदि वजन अधिक है तो उसे संतुलित करने के उपाय अपनाएं और कम कैलोरी युक्त भोजन लें।
धूम्रपान और एल्कोहल से दूर रहें।
पौष्टिक भोजन के साथ ही तरल पदार्थों को प्राथमिकता दें। इससे आपका इम्यून सिस्टम मजबूत होगा और आप किडनी फेल्योर जैसी समस्याओं से आसानी से बचे रहेंगे।

बुरा हाल है दिल्ली का
एम्स की रिसर्च के मुताबिक, महज दिल्ली में ही किडनी खराब होने की समस्या से पीड़ित नये मरीजों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। इनमें से केवल 5-10 प्रतिशत मरीजों को ही किसी तरह का इलाज मिल पाता है, क्योंकि इसका इलाज खासा महंगा होता है और आमतौर पर किडनी दान करने वाले भी नहीं मिल पाते। इसलिए ज्यादातर मरीजों की समय से पहले ही मौत हो जाती है।

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