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कांग्रेस को भारी पड़ा अति आत्मविश्वास

कहते हैं जोश में होश नहीं खोना चाहिए। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पर यह कहावत काफी हद तक सही बैठती है। चुनाव प्रचार के दौरान मिले जनसमर्थन से उत्साहित कांग्रेस को अति आत्मविश्वास का खामियाजा उठाना पड़ा है। यूपी में नेताओं की गैरजरूरी बयानबाजी ने खेल बिगाड़ा। वहीं पंजाब में चुनावों को हल्के में लेना पार्टी को भारी पड़ा। उत्तराखंड में बागियों की भरमार और उम्मीदवारों के चयन में गड़बड़ी के चलते कांग्रेस दहलीज तक पहुंचकर रुक गई।

कांग्रेस सूत्रों ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी को पूर्व सैनिक होने का फायदा मिला है। उत्तराखंड में करीब 15 फीसदी मतदाता पूर्व सैनिक और सैनिक हैं। पार्टी नेता मानते हैं कि राज्य सरकार के पास सैनिक बोर्ड के जरिए सभी सैनिकों की जानकारी होती है। एक माह में काफी कुछ मैनेज किया जा सकता है। उत्तराखंड विधानसभा के लिए 30 जनवरी को मतदान हुआ था। उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी नेताओं को गैरजरूरी बयानबाजी का खामियाजा उठाना पड़ा। बाहरी उम्मीदवारों को टिकट देने से भी पार्टी को नुकसान हुआ।

हालांकि, बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी बाहरी प्रत्याशियों को मैदान में उतारने का खामियाजा उठा चुकी है। पर यूपी में एक बार फिर कांग्रेस ने ‘जीत’ के नाम पर इसे दोहराने की गलती की। कांग्रेस ने आधे से ज्यादा बाहरी उम्मीदवारों को टिकट दिया था। ओबीसी में साढ़े चार फीसदी अल्पसंख्यक आरक्षण का भी पार्टी को नुकसान हुआ है। पार्टी महासचिव राहुल गांधी की जनसभाओं में भीड़ आई, पर संगठन न होने की वजह से भीड़ को वोट में नहीं बदल पाए।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, एक तरह जहां हम मुसलमानों को बेहतर तरीके से आरक्षण के लाभ को नहीं समझा पाए, वहीं इस मुद्दे को ज्यादा तरजीह देने से धुव्रीकरण हुआ। मुसलिम मतदाताओं ने भी कांग्रेस के मुकाबले सपा को वोट दिया। इसके अलावा चुनाव से ठीक पहले सपा के राज्यसभा सांसद रशीद मसूद को कांग्रेस में शामिल करना भी कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ।

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