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रिजल्ट में नहीं दिखा अन्ना फैक्टर का असर

शुरू से ही कयास लगाए जा रहे थे कि विधानसभा चुनावों पर अन्ना हजारे की मुहिम का असर पड़ेगा। किसी दल की हार-जीत में अन्ना फैक्टर निर्णायक साबित हो सकता है। लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया है कि अन्ना की मुहिम बेअसर रही।

इन चुनावों में जन लोकपाल या राजनीतिक भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं बना। भ्रष्टाचार में घिरे प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब में फिर से सत्ता पाई, तो लोकपाल के विरोधी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव उप्र में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आए। उत्तराखंड में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया है लेकिन इसका श्रेय टीम अन्ना की बजाय भाजपा की मुहिम ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ को गया।

जनलोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे और सरकार के बीच टकराव के बाद हिसार उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की हार हुई। तब इस बात को बल मिला कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में हजारे की मुहिम रंग लाएगी। टीम अन्ना ने बड़े पैमाने पर तो नहीं लेकिन चुनाव वाले राज्यों में दौरा कर भ्रष्ट और लोकपाल के विरोधियों को हराने की अपील की थी। इस हिसाब से उत्तर प्रदेश का चुनाव सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था।

संभावना व्यक्त की जा रही थी कि अन्ना फैक्टर यदि कारगर रहा तो बीजेपी को इसका फायदा हो सकता है और कांग्रेस घाटे में रहेगी। लेकिन मुलायम को फायदा हुआ। खुद मुलायम सिंह ने लोकसभा में लोकपाल विधेयक पेश करने का विरोध किया। इसलिए कहना नहीं होगा कि बीएसपी की हार के पीछे भी भ्रष्टाचार एकमात्र कारण नहीं रहा।

पंजाब में मुख्यमंत्री बादल, उनके बेटे और उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर जमीन घोटाले और आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप हैं। इन आरोपों के चलते बादल सरकार कोर्ट-कचहरी के चक्कर में भी फंसी। लेकिन वे फिर से सत्ता पाने में सफल रहे। उत्तराखंड में भी अन्ना फैक्टर का कोई असर नहीं दिखा।

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