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भट्टा पारसौल नहीं बन पाया ‘मुद्दा’

भटटा-पारसौल जैसे देश-दुनिया में छाए चुनावी मुद्दे गौतमबुद्ध नगर जिले में फेल हो गए हैं। जमीन अधिग्रहण को लेकर हुए इस आन्दोलन को राहुल गांधी ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। यहां वे अपने चहेते प्रत्याशी को वोट तो दिला पाए मगर जीत में तब्दील नहीं कर सके।
सबसे बुरी दशा भटटा-पारसौल कांड़ के अगुवा मनवीर तेवतिया की हुई। क्षेत्र के किसी भी गांव में वे हजार का आंकड़ा पार नहीं कर सके। आश्चर्यजनक बात यह रही कि बसपा को भट्टा और पारसौल गांवों में भी ठीक-ठाक वोट मिल गए। दूसरी ओर मुख्यमंत्री के गांव बादलपुर में बसपा को एकतरफा वोट मिले हैं।

सात मई, 2011 को भट्टा-पारसौल में प्रशासन और किसानों के बीच हुए खूनी संघर्ष में दो किसान और दो पुलिस कर्मियों की मौत हो गई थी। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने इस आन्दोलन के समर्थन में गांवों में डेरा डाल दिया था। देशभर की मीडिया ने इसे कवर किया और जमीन अधिग्रहण अधिनिययम पर तमाम राजनीतिक पार्टियों में बहस छिड़ गई। कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची जारी हुई तो पारसौल में राहुल के सारथी की भूमिका निभाने वाले ठाकुर धीरेन्द्र सिंह को प्रत्याशी बना दिया गया। उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए राहुल समेत कांग्रेस के तमाम दिग्गजों ने जनसभाएं कीं।

लेकिन, परिणाम बेहद खराब रहे। भटटा-पारसौल और अधिग्रहण से प्रभावित आसपास के आधा दजर्न गांवों में कांग्रेस प्रत्याशी को करीब 10,000 वोट तो मिल गए लेकिन, वे विधानसभा का चुनाव फिर भी हार गए। चौंकाने वाली बात यह रही कि कांड के लिए दोषी ठहराई जा रही बसपा के प्रत्याशी को यहां करीब 8,000 वोट मिल गए। अगर भट्टा गांव की बात करें तो, मनवीर तेवतिया को 564 वोट मिले हैं। इस गांव में कांग्रेस के प्रत्याशी को 454 और बसपा उम्मीदवार को भी 268 वोट मिले हैं। ऐसा ही पारसौल गांव में हुआ है। पारसौल में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 1,548 वोट मिले हैं। मनवीर तेवतिया को 1,003 और बसपा को यहां से भी 592 वोट मिले हैं। सबसे बुरी हालत जेडीयू प्रत्याशी मनवीर तेवतिया की रही।

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