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40 के बाद नियमित परीक्षण कराना है जरूरी

किडनी के कार्यों में खराबी आने पर मरीज के पास डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण ही अंतिम उपाय रह जाते हैं। डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण अत्यंत महंगा उपचार है, इसलिये सिर्फ 5-10 प्रतिशत मरीज ही किसी प्रकार से उपचार करवा पाते हैं।

इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ रीनल एवं किडनी प्रत्यारोपण विशेषज्ञ डॉ़ संदीप गुलेरिया के अनुसार किडनी हमारे शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, जिसका काम खून को साफ यानी परिष्कृत करना होता है। साथ ही शरीर में तरल, सोडियम एवं पोटैशियम (इलेक्ट्रोलाइट्स) के संतुलन में भी किडनी सहायक होती है। किडनी मूत्र के रूप में शरीर से पानी के अलावा विषैले और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर करने में सहायक है। रक्त किडनी के जरिये छनकर पूरे शरीर में संचरण करता है।

डॉ. गुलेरिया के अनुसार, ‘जब किडनी शरीर से पानी और बेकार पदाथरें को छानकर बाहर निकालने की क्षमता खो देती है, तब रीनल फेल्योर की स्थिति पैदा होती है। क्षमता का यह ह्रास लंबे समय तक चलता है। आमतौर पर अंतिम स्थिति आने से पूर्व तक कोई लक्षण प्रकट नहीं होता।’

किडनी को प्रभावित करने वाली सामान्य बीमारियों में मधुमेह, उच्च रक्त चाप, संक्रमण और मूत्र प्रवाह में रुकावट है। किडनी फेल्योर से बचने के लिए 40 साल की उम्र के बाद हर साल शारीरिक परीक्षण, रक्त परीक्षण एवं यूरिनलाइसिस जरूर करवाना चाहिए। मधुमेह व रक्तचाप को नियंत्रित रखना चाहिये। पेशाब में दिक्कत हो तो चिकित्सक से परामर्श करें।

नई तकनीक ने की मदद
नई तकनीकों की मदद से अब अलग रक्त समूह के लोगों से किडनी लेकर भी मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित करना संभव हो गया है। गत माह  50 साल के प्यारे लाल शुक्ल के शरीर में उसके छोटे भाई से किडनी लेकर प्रत्यारोपित की गई, जबकि दोनों के रक्त समूह अलग थे। अब तक सफल किडनी प्रत्यारोपण के लिये उसी सदस्य से किडनी ली जाती थी, जिसका रक्त समूह समान हो या ‘ओ’ रक्त समूह का हो, पर ‘प्लाज्मा एक्सचेंज प्रोसीजर’ नामक नई तकनीक से अन्य रक्तसमूह वाले व्यक्ति से किडनी लेकर प्रत्यारोपित करना संभव हो गया है। इस तकनीक के तहत किडनी प्राप्त करने वाले व्यक्ति के शरीर से एंटीबॉडी को हटा दिया जाता है, जिससे किडनी प्रत्यारोपण  के अस्वीकृत होने की आशंका कम हो जाती है।

खान-पान का परहेज है जरूरी
किडनी संबंधी समस्या से पीड़ित लोगों को नियमित समय पर संतुलित आहार लेना चाहिये। इन मरीजों को कुपोषण से बचने के लिये हल्का प्रोटीन भी लेना चाहिये। चोकरयुक्त आटे की रोटियों और अधिक फाइबर वाले अनाज का सेवन नियमित रूप से करना चाहिये। फलों के रस एवं पत्तेदार सब्जियों के सेवन से परहेज करना चाहिये। वसा का सेवन कम करना चाहिये तथा क्रीमयुक्त दूध की बजाय टोंड दूध पीना चाहिए। उच्च रक्तचाप वाले मरीजों को कम नमक खाना चाहिये तथा उन्हें डिब्बाबंद आहार से बचना चाहिये। कम से कम शक्कर तथा अल्कोहल का सेवन करना चाहिये। किडनी के कई मरीजों को डायलिसिस का समय निकट आने पर भूख और वजन में कमी की शिकायत होती है। ऐसे में आहार विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।

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