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कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाएंगे ये नतीजे

शुरुआत से ही इसे मिनी जनरल इलेक्शन कहा जा रहा था। और जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आए, तो उनमें राष्ट्रीय दलों के लिए अच्छे संकेत नहीं थे। जहां विकल्प मौजूद हैं, मतदाताओं ने वहां इन राष्ट्रीय दलों की बजाय क्षेत्रीय दलों को प्राथमिकता दी। इन पांच राज्यों में गोवा व उत्तराखंड में मतदाताओं के सामने कांग्रेस व भाजपा के अलावा कोई विकल्प नहीं था, मतदाताओं को इन्हीं दो में से किसी एक को चुनना था। उत्तर प्रदेश और पंजाब में मतदाताओं ने कांग्रेस व भाजपा की बजाय क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी तथा अकाली दल को तरजीह दी। उत्तर प्रदेश में तो दूसरे नंबर पर भी बसपा ही रही।

पंजाब के परिणाम इस लिहाज से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं कि वहां तमाम विपरीत परिस्थितियों (एंटी इनकमबेंसी, परिवारवाद व भ्रष्टाचार के आरोप) के बावजूद अकाली दल कांग्रेस को पराजित करने में कामयाब रहा। पिछले चार दशकों में यह पहला मौका है, जब पंजाब के मतदाताओं ने सरकार बदलने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।

हालांकि इन सभी में उत्तर प्रदेश के चुनाव को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा था। इस आधार पर यह माना जाना चाहिए कि राज्य के मतदाताओं ने जो फैसला दिया है, उसकी गूंज देश के हर हिस्से में किसी न किसी रूप में सुनाई देगी। खासकर केंद्र में, जहां यूपीए सरकार पहले से ही तमाम तरह के अंतर्विरोधों से जूझ रही है। कांग्रेस यह उम्मीद कर रही थी कि उत्तर प्रदेश में बिना उसके समर्थन के किसी के लिए भी सरकार बनाना संभव नहीं होगा। इस समर्थन का उपयोग वह केंद्र में अपनी सरकार को मजबूत करने के लिए कर सकेगी।

समाजवादी पार्टी के लिए किसी बाहरी समर्थन की जरूरत न रह जाने के बाद अब उसे यह चिंता होना स्वाभाविक है कि केंद्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के अगले दो वर्ष किस तरह कटेंगे। अगले सोमवार से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है। राज्यसभा में यूपीए पहले से अल्पमत में है। जुलाई में नए राष्ट्रपति के लिए चुनाव होने हैं। इसके बाद उप राष्ट्रपति के चयन का मसला है। वर्ष का अंत आते-आते गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। एनसीटीसी, रिटेल में एफडीआई, खाद्य सुरक्षा कानून, लोकपाल और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार सहित आर्थिक सुधार संबंधी कई विधेयक सरकार को संसद से पारित कराने हैं।

यूपीए के सामने दिक्कत यह होगी कि वह यदि इन कानूनों को अमली जामा नहीं पहना पाया, तो उसकी छवि में सुधार होना मुश्किल है और संसद में बिना राजनीतिक समर्थन के इन विधेयकों को पारित कराना उसके लिए काफी कठिन होगा। कांग्रेस को भरोसा था कि विधानसभाओं के चुनाव परिणाम उसे लोकसभा चुनावों के पहले अपनी छवि में आमूल-चूल बदलाव का मौका देने वाले होंगे। लेकिन परिणाम के बाद वह एक बार फिर समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी या तृणमूल कांग्रेस के रहम और करम पर निर्भर हो गई है।

प्रचार अभियान के दौरान व्यक्त की गई अपनी मंशा के अनुरूप राहुल गांधी या उनकी सलाहकार मंडली हो सकता है कि इसके बाद भी जोखिम उठाते रहने की कोशिश करती रहे। पर यह केंद्र में अपनी सरकार को दांव पर लगाकर और गठबंधन की राजनीति को अलविदा कहकर ही हो सकता है। हालांकि सरकार में बैठे उनकी पार्टी के बुजुर्ग नेता ऐसा होने देंगे इसमें काफी संदेह है। कुछ बयानवीरों को छोड़ दें, तो कांग्रेस का आम कार्यकर्ता इन परिणामों से उत्साहित नहीं है।

पांचों राज्यों में कहीं भी भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन कोई बहुत उल्लेखनीय नहीं रहा है। लेकिन गोवा को छोड़ किसी और राज्य में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर भी नहीं था। पंजाब में पिछले चुनाव में वह अपना सबसे बढ़िया प्रदर्शन दे चुकी थी और उत्तराखंड में उसे एंटी इनकमबेंसी का सामना करना था। इसलिए तुलना करें, तो कांग्रेस की बजाय उसका प्रदर्शन ज्यादा बेहतर रहा है। इन पांचों राज्यों के चुनाव में बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी भूमिका काफी सीमित रखते हुए राहुल गांधी को हर क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा अवसर देने की कोशिश की। टिकटों के बंटवारे से लेकर प्रचार अभियान तक।

केवल मणिपुर ही ऐसा राज्य है, जहां राहुल चुनाव प्रचार के लिए नहीं गए। उत्तर प्रदेश में अपनी स्टार पावर का पूरा इस्तेमाल करने और हर तरह के टोटके आजमाने के बावजूद उनकी पार्टी उम्मीदों से काफी पीछे रही है। जबकि पंजाब और उत्तराखंड में वह एंटी इनकमबेंसी का फायदा नहीं उठा पाई। इन परिणामों का कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

भाजपा के लिए दूसरा एडवांटेज केंद्र में मुख्य विपक्षी दल होने का भी है। पिछले एक वर्ष में संसद में जिस तरह का रवैया भाजपा का रहा है, उसमें यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वह बजट सत्र में यूपीए को कोई राहत देगी। उत्तर प्रदेश के परिणाम गैर कांग्रेस, गैर भाजपा दलों का मोर्चा बनाने की कोशिशों को भी तेज कर सकते हैं। यह संदेश जा रहा है कि जनता क्षेत्रीय दलों को तरजीह दे रही है। इससे नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और शरद पवार जैसों का हौसला बढ़ना तय है। बड़े राज्यों में गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़ दें, तो राष्ट्रीय दल हैं कहां? बिहार, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों में वे किसी न किसी क्षेत्रीय दल के भरोसे ही सरकार में हैं।

एक और मसला, जो कांग्रेस व भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए आने वाले समय में सिरदर्द साबित हो सकता है, वह क्षेत्रीय क्षत्रपों के बढ़ते महत्व का है। क्षेत्रीय क्षत्रपों को महत्वपूर्ण बनाना कांग्रेस की परंपरा में नहीं है। भाजपा आलाकमान को भी इसका अहसास होने लगा है कि एक सीमा से अधिक महत्व दिए जाने पर क्षत्रप कितना बड़ा सिरदर्द पैदा कर सकते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के बीच चल रहा शीतयुद्ध इसका उदाहरण है।

अभी यह मानना जल्दबाजी होगी कि उत्तर प्रदेश में कमोबेश फजीहत के बावजूद राहुल गांधी के लिए संभावनाएं ज्यादा नहीं बची हैं। इन चुनावों में उन्होंने अपनी छवि एक जुझारू, गंभीर और काफी तेजी से अपने को धूल-धक्कड़ की राजनीति के अनुकूल बनाने में लगे मेहनती युवा के तौर पर बनाई है। लोकसभा चुनावों के लिहाज से उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है। वोटर ने कांग्रेस को वोट नहीं दिया, पर राहुल गांधी को खारिज नहीं किया है। अब अपनी नेतृत्व क्षमता साबित करने के लिए राहुल कोई भी जोखिम उठा सकते हैं सिवाय इसके कि वह यूपी छोड़ें।

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