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मौन लहर पर सवार थी समाजवादी पार्टी

उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने बहुजन समाज पार्टी से सत्ता छीनकर समाजवादी पार्टी को सौंप दी है। सबसे पहले यूपी के मतदाताओं को शाबाशी कि 2007 की तरह 2012 में भी उन्होंने अपने लिए बहुमत की सरकार चुनी। सपा का यह अब तक का सवरेत्तम प्रदर्शन है। मुलायम सिंह इस विजय का श्रेय बेटे अखिलेश को दे रहे हैं। मुख्यमंत्री का ताज भी उन्हीं के सिर रखा जाए, तो आश्चर्य नहीं। मायावती हारीं जरूर, लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी दमदार उपस्थिति बनी रहेगी। दलित वोट बैंक पूरी निष्ठा व समर्पण के साथ उनके पीछे खड़ा है। वर्ष 2007 में मायावती का साथ देने वाले सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं ने ही उन्हें खारिज किया है, जिसके कारण वह एक सौ से ज्यादा सीटें खो बैठीं।

उत्तर प्रदेश अब भी सपा और बसपा का ही अखाड़ा बना है। इसमें दोनों राष्ट्रीय दल बेहद कमजोर पहलवान साबित हुए। भाजपा व कांग्रेस ने प्रचार में पूरी ताकत लगाई, नए प्रयोग किए। राहुल का आक्रामक चुनाव प्रचार पार्टी में बड़ी उम्मीदें जगा रहा था, पर खुद नेहरू-गांधी खानदान के गढ़ रायबरेली-अमेठी में उसे झटके लगे। भाजपा ने बड़ा दांव खेला था। उमा भारती को मध्य प्रदेश से लाकर और एनआरएचएम घोटाले के मुख्य आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को साथ लेकर पिछड़े वोटों को खींचने की कोशिश की।

समाजवादी पार्टी क्यों जीती? गैर-दलित मतदाता साफ-साफ मायावती सरकार के खिलाफ था, लेकिन भाजपा और कांग्रेस पर उसे भरोसा नहीं था कि वे बसपा को हराने की स्थिति में हैं। मतदाता इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचता है, इसका अध्ययन रोचक होगा। बहरहाल, जिस तरह 2007 में मुलायम सिंह सरकार की आपराधिक छवि के कारण उसे धराशायी करते हुए मतदाता ने बसपा को उसका प्रभावशाली विकल्प माना था, उसी तरह इस बार मायावती सरकार का सशक्त विकल्प सपा ही मानी गई। सपा ने भी यह वायदा किया है कि अबकी उसके राज में अपराधी बख्शे नहीं जाएंगे। अखिलेश पार्टी का नया चेहरा भी बन गए।

मुलायम सिंह के ‘गुंडा राज’ के जवाब में मायावती सत्ता में आई थीं और जनता मानती है कि बसपा राज में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई। फिर? दरअसल, जो ऐतिहासिक अवसर 2007 में मतदाता ने मायावती को दिया, उसका बेहतर उपयोग करने में वह चूक गईं। दलित एजेंडे को आगे बढ़ाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी, पर वास्तविक विकास उपेक्षित ही रहा। भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा बना रहा,  उनके कई विधायकों-मंत्रियों ने उनकी सरकार को शर्मशार किया, ऐन चुनाव के मौके पर उन पर कार्रवाई का संदेश भी गलत गया, सर्वजन के विकास के दावे सीमित रहे, और खुद मायावती जनता ही नहीं, अपने अधिसंख्य विधायकों के लिए भी दुर्लभ बनी रहीं। खैर, अब सपा को साबित करना है कि वह जनता के बहुमत का आदर करने और जन आकांक्षाओं को पूरा करने की कूव्वत रखती है। पांच साल का मौका कम नहीं होता।

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