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जनता का फैसला

यह सभी मान रहे थे कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, लेकिन उसे इतना बड़ा बहुमत मिलेगा, यह बहुत कम लोग ही सोच रहे थे। एक पार्टी को पूर्ण बहुमत देकर मतदाताओं ने यह आश्वस्ति कर ली है कि पांच साल तक स्थिर शासन चलेगा और सत्तारूढ़ पार्टी के पास अच्छा प्रशासन न देने का कोई बहाना नहीं होगा। पंजाब में यह माना जा रहा था कि सत्तारूढ़ अकाली-भाजपा गठबंधन छोटे-मोटे अंतर से ही सही, फिर से सरकार नहीं बना पाएगा, लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन ने कांग्रेस को अच्छे-खासे अंतर से मात दे दी है।

उत्तराखंड में भी यह माना जा रहा था कि रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के दौर के भ्रष्टाचार और कुशासन का खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ेगा और कांग्रेस को साफ विजय हासिल होगी। नतीजों ने इस कयास पर भी पानी फेर दिया। गोवा में भाजपा ने भारी जीत हासिल की। सिर्फ मणिपुर में कांग्रेस को निर्विवाद जीत हासिल हुई है। कुल जमा इन चुनावों में सबसे भारी नुकसान कांग्रेस को हुआ है, जिसे यह उम्मीद थी कि इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन केंद्र की सरकार को कुछ ताकत प्रदान करेगा, जो कई भीतरी मुसीबतों से घिरी रहती है।

भाजपा का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा नहीं रहा है, बावजूद इसके कि दो राज्यों में उसका प्रदर्शन आशा से बेहतर रहा है और पंजाब में भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद वह सत्ता की भागीदार बनी रहेगी। उत्तर प्रदेश में उसे सिर्फ यह संतोष रहेगा कि उसका प्रदर्शन कितना ही खराब हो, कांग्रेस से वह आगे है। इन चुनावों ने फिर से मतदाताओं के उसी रुझान को व्यक्त किया है, जो पिछले कुछ वर्षो में दिखाई पड़ता रहा है। ऐसा नहीं है कि जाति और भावनात्मक मुद्दे मतदाता को प्रभावित नहीं करते, लेकिन अब मतदाता सिर्फ जाति के नाम पर या भावनात्मक जुड़ाव के नाम पर वोट नहीं देता, वह ठोस जमीनी परिणाम चाहता है।

अब चुनावी मुद्दे आर्थिक विकास से और अच्छे प्रशासन से जुड़े हुए हैं, अगर इन कसौटियों पर कोई पार्टी खरी उतरती है, तभी उसे वोट मिलता है। जिन पार्टियों या राजनेताओं ने वक्त में बदलाव को समझ लिया है और अपने को उसके मुताबिक ढाल लिया है, वे सफल हुए हैं और जो नहीं समझ पाए, वे नहीं जीत सके।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण उत्तर प्रदेश है। 2007 के चुनावों ने समाजवादी पार्टी को जमीन पर उतार दिया था। इसे बाहुबलियों व माफिया की पार्टी मान लिया गया था, जिसका कोई विकास का एजेंडा नहीं था। मुलायम सिंह यादव के सुपुत्र अखिलेश यादव ने यह स्थिति बदली, उन्होंने बाहुबलियों व अपराधियों को पार्टी से दूर किया और जनता को आधुनिक विकास तथा अच्छे प्रशासन का संदेश दिया। सपा की जीत अखिलेश के नए अंदाज और शैली की जीत है। बसपा के राज में विकास भी काफी हुआ और गुंडागर्दी पर भी लगाम लगी, लेकिन जनता उगाही के किस्सों से आजीज आ गई और उसने पार्टी को बड़ा झटका दिया।

अगर बसपा अगले पांच साल में अपने को बदलती है, तो उसे अगले चुनाव में उम्मीद हो सकती है। कांग्रेस को अलबत्ता बहुत सख्त आत्मनिरीक्षण करना होगा। समस्या यह है कि राहुल गांधी हालांकि ईमानदार और गंभीर नेता दिखते हैं, लेकिन जो संदेश वह जनता तक पहुंचाते हैं, वह चालीस बरस पुराने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे का नया रूप दिखता है। इस दौरान देश काफी आगे जा चुका है और अब लोगों की उम्मीदें दूसरी हैं। फिर स्टार प्रचारक कितने ही चमकदार हों, वे जमीनी संगठन और नेताओं का विकल्प नहीं हो सकते। जनता का संदेश साफ है- वह पार्टियों और नेताओं से ठोस काम और जवाबदेही चाहती है और भावनात्मक वजहों से रियायत करने का उसका इरादा नहीं है।

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