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जब पुतिन रो पड़े

व्लादिमीर पुतिन का रोना हैरत में डालने वाली घटना थी। राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे जैसे ही उनके पक्ष में आए और उन्हें विजयी घोषित किया गया, वह मानेज चौराहे पर इकट्ठे लोगों के सामने फफककर रो पड़े। बीते बारह साल से पुतिन सत्ता में हैं। लोगों के बीच उनकी छवि माचो मैन की है। यहां तक कि भयावह त्रासदियों में भी वह बेहद संयत रहे। डुब्रोवका और बेसलान आतंकी हमलों के वक्त भी जनता के सामने उनकी आंखों से आंसू नहीं निकले थे, लेकिन बीते रविवार की रात व्लादिमीर पुतिन रोए। उन्होंने कहा, ‘मैंने आपसे वायदा किया था कि हम जीतेंगे और हम जीत गए। यह रूस की जीत है। एक खुली और ईमानदार लड़ाई में हमारी जीत हुई है।’ इतना कहते-कहते पुतिन की आंखों में आसूं छलछला उठे।

हालांकि पुतिन की एकतरफा जीत पर किसी को संदेह नहीं था। हालिया जनमत सर्वेक्षणों ने भी इसकी भविष्यवाणी की थी कि उन्हें 60 फीसदी वोट तो मिलेंगे ही। ऐसे में, पुतिन क्यों रोए? कुछ लोग इसे केजीबी प्रशिक्षित शख्स का कमजोर प्रदर्शन कह सकते हैं। वहीं, कुछ अन्य ये सफाई दे सकते हैं कि बीते कुछ हफ्तों से पुतिन विरोधी लगातार धरना-प्रदर्शन कर थे, इससे पुतिन सकते में आ गए थे और इस माहौल में मिली जीत ने उन्हें भाव-विह्वल कर दिया। सोमवार की सुबह पुतिन ने खुद कहा, ‘बर्फीली हवाओं के चलते आंखों से आंसू निकले।’ वैसे भी, पुतिन को भावनाओं की क्या जरूरत? वह अपने शासन पर गर्व कर सकते हैं। उन्होंने 2000 के दौर में स्थिर व समृद्ध रूस की स्थापना की। इसकी तुलना में उन्हें 1990 के दशक की अराजकता विरासत में मिली थी।

खैर, पुतिन के आगे कई चुनौतियां हैं। उन्हें अपने हमवतनों व दुनिया भर के निवेशकों को यह बताना पड़ेगा कि रूस केवल रहने के लिए ही अच्छी जगह नहीं है, बल्कि निवेश के मुफीद भी है। इसके लिए पुतिन को चार कदम उठाने होंगे। पहला, लोगों की आवाज उन्हें सुननी होगी। दूसरा, निवेशकों के लिए तमाम रास्ते खोलने होंगे। तीसरा, पुतिन अपनी सलाहकार टीम में तेज-तर्रार व जानकार लोगों को शामिल करें। और चौथा, उन्हें अपने नेतृत्व के स्तर को शीर्ष पर ले जाना होगा।
द मॉस्को टाइम्स, रूस

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