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निर्वाचन आयोग की जय-जय, मतदाता की भी जय-जय

इस बार के विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग और मतदाताओं का ही परचम लहराया। रिकार्ड 59.48 प्रतिशत मतदान और उसमें भी 60 प्रतिशत से अधिक ‘आधी आबादी’ के योगदान ने एक ऐसा इतिहास रच डाला जिस पर प्रदेश के हर मतदाता को नाज हो रहा है।

अकल्पनीय से लगने वाले भारी मतदान ने ही इस बार के चुनाव का रोमांच बढ़ा दिया है। आयोग के सामने कई बड़ी चुनौतियां थीं। वोट न डालने के आदी पड़ गए मतदाताओं को झकझोर कर उन्हें उनकी लोकतांत्रिक ताकत का एहसास कराना था, तो दूसरी ओर चुनावों में काले धन के प्रभाव को रोकने के लिए कदम उठाने थे। आयोग ने एक साथ कई मोचरे पर लड़ाई लड़ी और जीती। इस मतदाता क्रान्ति के लिए साल भर से तैयारियां की गयीं।

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के चुनावों को एक खास नजरिए से देखा और बहुत ही रणनीतिक तरीके से पूरा चुनाव प्रबंधन किया। देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश के माथे पर कम मतदान का एक ऐसा दाग था जिसे धुलना आसान नहीं था। आयोग ने प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा की देखरेख में अब तक का सबसे बड़ा मतदाता जागरूकता अभियान छेड़ा। इसमें ‘आओ राजनीति करें’ के नारे के साथ ‘हिन्दुस्तान’ ने भी आयोग के कदम से कदम मिलाया। पहली बार प्रदेश के सभी 315 तहसील मुख्यालयों तथा 75 जिला मुख्यालयों पर मतदाता पंजीकरण केन्द्र खोलने के साथ ही मतदाता मेले आयोजित कर लाखों नाम मतदाता सूची में जोड़े गए। युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए चार हजार से अधिक शिक्षण संस्थाओं में भी मेले लगाए गए। सुविधा के लिए जगह-जगह ड्रॉप बाक्स लगाए गए। ताकि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का फार्म डाल सकें।

 

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