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आखिर कुछ तो था बदला-बदला

तीन मार्च की शाम उत्तर प्रदेश में मतदान खत्म होने से लेकर पांच मार्च की शाम तक विभिन्न चैनलों के एग्जिट पोल पर तीखा वाद-विवाद छिड़ा रहा। उत्तराखंड और पंजाब में मतदान हुए 34 दिन बीत गए और यूपी में भी पहले चरण में वोट डालने वाले 27 दिन से नतीजे आने का इंतजार कर रहे हैं। इस लंबी अवधि में नतीजों और संभावित राजनीतिक समीकरणों पर जितने संभव हो सकते थे, कयास लगा लिए गए, बहसें हो चुकीं और शर्ते भी लग गईं। फिर भी एक ‘लेकिन’ रह गया कि इस बार जो 15 से 20 फीसदी वोट ज्यादा पड़े हैं, वे किधर गए हैं या वे क्या गुल खिलाने वाले हैं और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि भारी संख्या में मतदान करने वाली युवा पीढ़ी चुनाव परिणाम को किस तरह प्रभावित करेगी? इन कारकों को बार-बार उद्धृत करके लोग कह रहे हैं कि देखना, नतीजे चौंकाने वाले होंगे। इतनी उत्सुकता शायद ही पहले किसी चुनाव ने जगाई हो, खासकर यूपी में। बहुत हुआ। नतीजा खुलने ही जा रहा है।

फिर भी चंद बातें हैं, जो गौर करने लायक हैं। हम बात यूपी पर ही करेंगे, क्योंकि यहां चुनावी संग्राम घमासान ही नहीं, चौकोना-पंचकोना भी है। उत्तराखंड और पंजाब में लगभग सीधी लड़ाई है, जबकि मणिपुर तथा गोवा के चुनाव नतीजे बहुत उत्सुकता यहां वैसे भी नहीं जगाते।

भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश की तेजतर्रार नेता उमा भारती को उत्तर प्रदेश में जोर-शोर से उतारा। वह चरखारी से खुद चुनाव ही नहीं लड़ीं, बल्कि पूरे प्रदेश में भाजपा की स्टार प्रचारक भी बनीं। यह नई बात नहीं है। नई बात यह है कि उमा भारती ने एक भी विवादास्पद बयान नहीं दिया। बाबरी मस्जिद ध्वंस से लेकर मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने,  इस्तीफा देने को मजबूर किए जाने और भाजपा से बाहर होने और पार्टी में वापसी तक उमा भारती अपने विवादास्पद, टकराव वाले भाषणों के कारण हमेशा चर्चा में रहीं। उनकी तीखी जुबान चर्चित है, लेकिन इस चुनाव प्रचार में वह आश्यर्चजनक रूप से संयत रहीं। क्यों? क्या यह भाजपा की, यानी नितिन गडकरी की, जो उन्हें भाजपा में वापस लाए और यूपी के चुनाव की बागडोर-सी सौंप गए, रणनीति का हिस्सा था? जिस वरुण गांधी को 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने युवा और तेज-तर्रार चेहरे के रूप में पेश किया और जिनके कटु व अशोभनीय बयानों ने तूफान मचाया था, उन्हें इस बार क्यों पीलीभीत से बाहर प्रचार करने नहीं भेजा गया? और वहां भी कैसे वरुण शांत-संयत बने रहे? क्या यह भी भाजपा की चुनावी रणनीति में शामिल था? अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने की चर्चा सिर्फ लालकृष्ण आडवाणी ने की और वह भी जब वह ऐन अयोध्या से ही चुनाव प्रचार की शुरुआत कर रहे थे। उसके बाद भाजपा नेताओं के भाषणों से राम मंदिर की चर्चा नदारद ही रही। नरेंद्र मोदी संजय जोशी के कारण यहां प्रचार करने नहीं आए या बुलाए नहीं गए? क्या यह सब सोचा-समझा था? क्या यह भाजपा के चुनाव नतीजों पर कुछ असर डालने वाला है? कोई संकेत करता है?

कांग्रेस पर आते हैं। गौर कीजिए कि सबसे ज्यादा विवादास्पद बयान कांग्रेसी नेताओं ने दिए। याद ही होगा मुस्लिम आरक्षण वाला सलमान खुर्शीद का बयान। इस बयान ने खूब हंगामा मचाया। चुनाव आयोग की नोटिस के बाद भी खुर्शीद अपने बयान पर अड़े रहे। यहां तक बोल गए कि चाहे आयोग मुझे फांसी पर लटका दे..। वह चुप हुए, तो बेनी प्रसाद वर्मा उसी तरह की विवादास्पद बातें करने लगे। दिग्विजय सिंह और श्रीप्रकाश जायसवाल ने कम विवादास्पद बयान नहीं दिए। आचार संहिता के उल्लंघन की सबसे ज्यादा शिकायतें कांग्रेसियों की हुईं और सबसे ज्यादा नोटिस व चेतावनियां भी बड़े कांग्रेसी नेताओं को ही मिलीं? राहुल गांधी को लीजिए। जैसे-जैसे चुनाव का माहौल गरम होता गया, वैसे-वैसे कांग्रेसी ‘युवराज’ का गुस्सा बढ़ता गया। चुनाव सभाओं में एकाएक आक्रोशित हो जाना और बात-बात में बांहें चढ़ा लेना क्या सिर्फ ‘स्टाइल’ था? दौड़ते-दौड़ते खादी के कुरते-पाजामे की रंगत बदल गई और दाढ़ी बढ़ आई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस को वापस लाने की अकेले दम लड़ाई लड़ रहा यह योद्धा क्यों कुछ ज्यादा ही व्याकुल रहा? क्या कांग्रेसी नेताओं में चुनाव प्रचार का रणनीतिक-समन्वय नदारद था या यह ‘फ्री फॉर ऑल’ भी रणनीति ही थी? एग्जिट पोल भी नहीं आए थे और दिग्विजय सिंह ने कह दिया कि यूपी के चुनाव नतीजे राहुल की सफलता-विफलता का पैमाना नहीं होंगे। क्या यह कोई पूर्वाभास है?

प्रदेश में पांच साल निर्विघ्न राज कर चुकी बहुजन समाज पार्टी की ले-देकर एक ही स्टार नेता हैं-  मायावती। वह अपना ताज बचाने इस चुनाव में निकलीं। उनकी सभाओं में हमेशा की तरह खूब भीड़ जुटी। वह उत्साहित होकर अपनी ही शैली में भाषण देती रहीं। सपा, भाजपा और कांग्रेस, तीनों उनके निशाने पर रहे, लेकिन गौर कीजिए कि इस बार मायावती अपने साथ न सतीश चंद्र मिश्र को ले गईं, और न ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी को। नसीमुद्दीन तो कुछ चुनाव-मंचों पर मायावती के साथ दिखाई भी दिए, लेकिन सतीश चंद्र मिश्र बिल्कुल अलग ही चुनाव-प्रचार करते फिरे। 2007 में वह बराबर और ठीक मायावती के बगल में रहते थे। क्या यह बड़ा संकेत नहीं है? क्या यह नतीजों की ओर भी कुछ महत्वपूर्ण संकेत नहीं करता? अगर यह सोची-समझी चाल थी, तो भी क्या यह बड़े मायने नहीं रखती?

और, चुनाव नतीजों की पूर्व संध्या पर उत्साह से लबरेज समाजवादी पार्टी को देखिए। सपा की पिछली सरकार का ‘आपराधिक रिकॉर्ड’ का कलंक धोने के लिए मुलायम सिंह चुनाव मंचों से अपने प्रत्याशियों से हाथ जोड़कर क्षमा मंगवाते रहे। उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को पार्टी का नया चेहरा बनाकर पेश किया और इसके लिए प्रच्छन्न पारिवारिक नाराजगी का भी खतरा मोल लिया। अखिलेश ने भी अपना आगाज आतुर डीपी यादव को पार्टी में लेने से इनकार करके किया।

अखिलेश के नेतृत्व में यह सपा का बहुत समझा-बूझा स्टैंड था। सपा के चुनाव घोषणापत्र में बेरोजगारी भत्ते की घोषणा क्या हुई, प्रदेश भर के जिला रोजगार कार्यालयों पर रजिस्ट्रेशन कराने के लिए युवाओं की भीड़ जुटने लग गई (बेरोजगारी भत्ता भाजपा के भी घोषणापत्र में है)। क्या इसमें चुनाव नतीजों के कुछ संकेत पढ़े जा सकते हैं? अंतिम चरण तक आते-आते दैनिक पत्रों, टीवी चैनलों और बड़ी पत्रिकाओं तक के पन्नों पर साइकिल सवार, लाल टोपी धारी युवा अखिलेश छाने लगे। कांग्रेसी युवराज से भी ज्यादा। क्या इसके कुछ निहितार्थ हैं या इसमें कुछ अति उत्साह था? बहरहाल, अटकलों-अनुमानों का वक्त गया। आइए चलें, टीवी खोलें। गिनती शुरू होने वाली है।

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