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विधानसभा चुनाव नतीजों के राजनीतिक मायने

विधानसभा चुनाव 2012 के नतीजों से केंद्र की संप्रग सरकार की छवि और स्थायित्व पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा। क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आर्थिक सुधारों के अपने बड़े एजेंडे का आगे बढ़ा पाएंगे? अभी सहयोगी ममता बनर्जी उन्हें रोक रही हैं। चुनाव के नतीजों से राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी की भूमिका भी तय होगी। खुद उन्होंने उत्तर प्रदेश में आगे बढ़कर नेतृत्व का फैसला लिया था, इस समर में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है। यूपीए की एक और तात्कालिक चिंता है जुलाई में होने वाला राष्ट्रपति चुनाव।

अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौथे नंबर पर रहती है और पंजाब व उत्तराखंड में मामला करीबी रहा, तो यह पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं होगी। वैसे तो अब तक उत्तराखंड और पंजाब में कोई भी सत्ताधारी दल सत्ता में लौटा नहीं है। कांग्रेस ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि इन दो सूबों में जीत और उत्तर प्रदेश में सम्मानजनक स्थिति पाकर वह मुश्किलों से उबर जाएगी। पार्टी के एक तबके को उम्मीद है कि अगर कांग्रेस लखनऊ में मुलायम सिंह सरकार को सहारा देती है, तो उसे दिल्ली में 22 सांसदों का फायदा होगा और ममता के बागी तेवर से छुटकारा मिल जाएगा।

बेशक, यूपीए मायावती के साथ भी सौदा कर सकता है। लोकसभा में उनके 20 सांसद हैं। अगर उनसे लखनऊ की सत्ता छिनती है, तो उन्हें केंद्र की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तभी वह सपा से शत्रुता निभा सकती हैं। कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा का अचानक यह बयान देना कि मुलायम सिंह की तुलना में मायावती सौ गुना बेहतर सहयोगी हैं और चुनाव खत्म होते ही पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की गिरफ्तारी से यह कयास लगने लगा है। लेकिन चुनाव के तुरंत बाद मायावती से समझौता पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। आखिरकार चुनाव प्रचार में राहुल गांधी ने मायावती पर खूब हमले किए। खैर, बेनी प्रसाद वर्मा के बयान का एक दूसरा मतलब यह भी है कि वह अपनी खाल बचाने में जुटे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वह बीएसपी के साथ जाने के दरवाजे खोल रहे हैं। हालांकि राहुल सपा से समझौते के पक्षधर नहीं हैं। वह मानते थे कि अगर राष्ट्रीय पार्टी क्षेत्रीय दल का छोटा-मोटा पार्टनर बनता है, तो रास्ते बंद हो जाते हैं। फिर मुस्लिम जनाधार वापस पाने की उनकी कोशिश अधूरी रह जाएगी। राहुल गांधी ने काफी मेहनत की, लेकिन प्रदेश के लोगों के लिए शायद वह बसपा के विकल्प नहीं हैं। विकल्प के तौर पर अखिलेश यादव दिख रहे हैं।

सोमवार से बजट सत्र शुरू हो रहा है। इसके तत्काल बाद राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव होंगे। कांग्रेस चाहेगी कि उसके द्वारा नामित सदस्य राष्ट्रपति भवन पहुंचें। 2014 के आम चुनाव के लिहाज से यह महत्वपूर्ण होगा, पर सपा की जीत से कांग्रेस का खेल बिगड़ सकता है। वैसी सूरत में पार्टी को राष्ट्रपति के लिए सपा से सहमति लेनी पड़ेगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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