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भला हो बुरा मानने वालों का होली पर

फोन की घंटी बजने पर चोंगा उठाते ही सुनाई पड़ा, कौन बोल रहा है? बोल आप ही रहे हैं, मैं तो सुन रहा हूं- फागुनी असर में जवाब दिया मैंने। इस होली पर आप क्या जलाना चाहेंगे? झुंझलाहट का स्वर था उनका। न परिचय, न दुआ-सलाम अपना परिचय तो दें श्रीमंत- मैंने कहा। टेलीफोनिक सर्वेक्षण द्वारा अज्ञात लोगों से हम जानकारी ले रहे हैं कि वे क्या जलाना चाहेंगे इस होली पर। इस बेकाबू महंगाई में त्योहारों पर मिडिल क्लास परिवारों के चूल्हे जलते रहें, यही बहुत है- मैंने कहा।

परिहास छोड़ काइंडली गंभीर जवाब दें- इस बार उनके स्वर में विनय था। सच्चाई यह है कि हिरण्यकश्यपु जलाना चाहते थे प्रहलाद को, जल गई उनकी बहना। क्या गारंटी है कि जो जलाना चाहे, वह जल ही न जाए? वैसे भी, आजकल कौन नहीं जल रहा है? रोस्ट हो रही है आत्मा। अब उस टाइप की आत्मा है ही कहां, जिसे कर्मयोगी प्रभु ने अजर-अमर बताया था।

काट दिया कनेक्शन.., आग, फाग और राग के उत्सव पर क्या जलाना चाहेंगे वाले अज्ञात सज्जन ने। प्रशासन प्रकारांतर से ऑल रेडी जली-भुनी जनता से अपील करता है- हरे पेड़ न जलाएं, बुरी प्रथाओं को जलाएं। रासायनिक रंगों का प्रयोग न कर हर्बल होली खेलें। ऐसी हुल्लड़बाजी न करें, जो पड़ोसी को पसंद न हो। दरअसल, पूजा के पहले बुदबुदाए जाने वाले मंत्रों की तरह होती हैं ऐसी अपीलें। बाद में सब कुछ स्वाहा..।

तथाकथित बुरी लगने वाली प्रथाएं होली पर ‘बुरा न मानो’ की अग्रिम क्षमा-याचना के साथ ही शालीनता के पाले में आ जाती है। ये उपहारों के आदान-प्रदान और दौलत के प्रदर्शन वाला त्योहार नहीं है यह मतभेद, मनभेद तज गले लगने वाला मौका है। रंग की बरसती फुहारों में भंग में झूमता मन, उछलने-कूदने और गैर शास्त्रीय शैली में नाचने वाला त्योहार.. वनस्पति तक ‘बौरा’ जाते हैं, कन्वर्ट हो जाते हैं बाबा देवर में। 

नीति विरोध के तमाम उपकरणों को बलाए-ताक यह कामना कि भला हो उन महानुभावों का, जो होली पर भी जलने-जलाने की बात करते हैं। शेष अगली होली पर। ध्यान रहे यह ‘अगली’ अंग्रेजी भाषा वाला शब्द नहीं है।

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  • Web Title:भला हो बुरा मानने वालों का होली पर