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रफ्तार की विडंबना

सभ्यता के विकास का पूरा सफर असल में रफ्तार का खेल है, बल्कि विकास और गति जैसे एक-दूसरे के पूरक हो गए हैं। पहिए के आविष्कार ने रफ्तार को पहले पंख दिए। आने वाले दिनों में यह अतिमानवीय हदों के पार जाती दिखी। आज की तारीख में रफ्तार जैसे माध्यम नहीं रही, सीधे मूल्य हो गई है। सबसे अच्छी कार वह है, जो सबसे तेज दौड़ सके। सबसे अच्छे फोन वे हैं, जिनमें सबसे तेज डाटा ट्रांसफर हो सके। ये स्थूल उदाहरण हैं। गहराई से देखेंगे, तो लगेगा कि हमने समय की शिला को चूर-चूर कर डाला है और हम उसके एक-एक मिनट व सेकंड का नहीं, नैनो सेकंड तक का इस्तेमाल कर लेने पर तुले हैं। विडंबना यह है कि जो जितनी तेजी से भाग रहा है, उसके पास समय की उतनी ही कमी हुई जा रही है। लेकिन रफ्तार की इस विडंबना को हम समझने को तैयार नहीं हैं।..टहलते हुए आप हर तरफ देखते हैं, हर किसी का हालचाल ले लेते हैं, दौड़ते हुए आप बस एक तरफ देखते हैं, अपनी भी सांस अपने वश में नहीं रहती। रफ्तार ने हमारे भीतरी अवयवों को बदल डाला है। इसीलिए अब शायद किसी से मिलने पर हमारा ध्यान भटकता रहता है- बातचीत के सिरे टूटते रहते हैं, रिश्तों से जुड़े पुराने ब्योरे करीने से याद तक नहीं आते। दरअसल यह उस सभ्यता की कीमत है, जो हमने रफ्तार के माध्यम से बनाई है- यह समझे बिना कि इसने सबसे ज्यादा हमें ही कुचला है। हम बस दौड़ते जा रहे हैं, यह जाने बिना कि हम जा कहां रहे हैं।
तहलका वेब पोर्टल में प्रियदर्शन

 

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