DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दहलती हुई धरती

दिल्ली और आसपास के इलाकों में सोमवार दोपहर को भूकंप के जो झटके महसूस हुए, वे कम तीव्रता के थे, इसलिए उनसे किसी किस्म के नुकसान की खबर नहीं है। ये झटके रिक्टर पैमाने पर 4.9 तीव्रता के थे और इनका केंद्र दिल्ली-हरियाणा सीमा पर बहादुरगढ़ में जमीन से तकरीबन दस किलोमीटर नीचे था। ये झटके फिर से याद दिला गए कि दिल्ली उन इलाकों में से है, जहां भूकंप का खतरा काफी बड़ा है और उस मुकाबले इस खतरे से निपटने की तैयारी नहीं है। भूगर्भ विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली में पांच से छह तीव्रता के भूकंप आम तौर पर आते हैं, कभी-कभार छह से सात तीव्रता के भूकंप भी आ सकते हैं, लेकिन यह आशंका भी है कि कभी सात से आठ तीव्रता का भूकंप भी आ सकता है। अगर कोई बड़ा भूकंप आया, तो बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है। दिल्ली से दो संवेदनशील भूगर्भीय संरचनाएं गुजरती हैं, दिल्ली-हरिद्वार रिज और दिल्ली-मुरादाबाद फॉल्ट। इन संरचनाओं में किसी बदलाव से भूकंप के झटके महसूस होते हैं। वैसे तो समूचा उत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्र ही भूकंप प्रभावित है और हिमालय में आए तमाम बड़े भूकंपों के झटके उत्तर भारत को हिलाते हैं। सौभाग्य से आधुनिक समय में बहुत बड़े भूकंप दिल्ली के आसपास नहीं आए, लेकिन इतिहास में कई बड़े भूकंपों का आना दर्ज किया गया है। इनमें 1720 का बड़ा भूकंप भी है, जिसमें कुतुब मीनार की ऊपर की दो मंजिलें ढह गई थीं। 1956, 1960 और 1966 में दिल्ली और आसपास काफी तीव्रता के भूकंप आए थे, जिनमें कुछ लोग मारे गए थे और काफी जख्मी हुए थे। अब दिल्ली और आसपास के इलाकों की आबादी बहुत बढ़ गई है और ऐसी इमारतें बन गई हैं, जो भूकंप में खतरनाक हो सकती हैं। दिल्ली की अवैध बस्तियों में ऐसी इमारतों की बहुतायत है। इसके अलावा जो पुराने एक या दो मंजिले मकान थे, उनके ऊपर असुरक्षित ढंग से चार-चार मंजिलें खड़ी कर दी गई हैं, जिनके ढहने की खबरें यदा-कदा आती रहती हैं। अगर तेज भूकंप आया, तो यहां जबर्दस्त नुकसान हो सकता है, क्योंकि इन इलाकों में आबादी का घनत्व भी बहुत ज्यादा है और सामान्य स्थिति में ही वहां एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड की गाड़ियां नहीं पहुंच पातीं, तो भूकंप के वक्त में तो यह तकरीबन नामुमकिन हो जाएगा।

दिल्ली और देश के दूसरे शहरों से ये खबरें अमूमन आती हैं कि आग लगने की हालत में फायर ब्रिगेड के पहुंचने का रास्ता ही नहीं था। पिछले दिनों कोलकाता के एम्री अस्पताल में लगी आग के दौरान भी ऐसा हुआ था, जबकि यह अस्पताल कोलकाता के संभ्रांत इलाके में है। दिल्ली के भी संभ्रांत इलाकों में जमीन के दाम इतने हैं कि छोटी-छोटी गलियों में बड़ी-बड़ी इमारतें बना ली गई हैं, और प्राकृतिक आपदा में इनकी स्थिति भी गरीब बस्तियों से बेहतर नहीं होगी। दिल्ली में प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) का गठन 2008 में हुआ है, लेकिन आपदा संरक्षण के मामले में हर स्तर पर इतनी लापरवाही है कि प्राधिकरण भी बहुत कुछ नहीं कर सकता। नागरिक भी मकान बनाते या खरीदते समय प्राकृतिक आपदाओं की आशंका को मद्देनजर नहीं रखते, डीडीए या ऐसे ही संस्थानों ने बस्तियों की योजना बनाते हुए यह नहीं सोचा कि जरूरत के वक्त फायर ब्रिगेड पहुंच सकती है या नहीं, न तमाम विभागों में ऐसे हादसे के वक्त तालमेल का भरोसा किया जा सकता है। हर भूकंप हमें एक चेतावनी देता है कि अब भी वक्त है, हम संभल जाएं, लेकिन हम लोग हैं कि धरती कंपा देने वाली चेतावनी तक अनसुनी कर देते हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दहलती हुई धरती