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अब ओलंपिक की बारी

ओलंपिक क्वालीफायर के अपने अंतिम मुकाबले में भारत ने जिस तरीके से फ्रांस को रौंदा, वह काबिल-ए-तारीफ है। वैसे भारतीय हॉकी टीम परंपरागत शैली में खेलती है, परंतु उसने जता दिया कि टर्फ फील्ड में भी उसकी कोई बराबरी नहीं। हालांकि भारत में क्रिकेट को ज्यादा लोकप्रियता मिली हुई है, किंतु हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है और इस जीत ने हमारी उम्मीदों को आसमान पर पहुंचा दिया है। ऐतिहासिक ध्यानचंद मैदान पर दर्शकों की जो भीड़ उमड़ी, उससे जाहिर होता है कि हॉकीप्रेमियों की आज भी कोई कमी नहीं है। सर्द हवाओं के बीच अनेक दर्शक अपनी कमीजें उतारकर खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे थे। बेहद अफसोस की बात है कि हॉकी खिलाड़ियों को न तो ज्यादा पैसा मिलता है और न ही विज्ञापन। अब टीम को ओलंपिक का टिकट मिल गया है। उम्मीद है कि अब वहां भी टीम इंडिया का विजय अभियान जारी रहेगा और उसके प्रति देश व समाज का रवैया बदलेगा।
मनीष कुमार, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली

घेरे में लाल डोरा?
दिल्ली के सभी गांव लाल-डोरा क्षेत्र में आते हैं। इसके अधीन आबंटित आवासीय प्लॉटों व कॉलोनियों को पहले ही अधिकृत एवं नियमित किया जा चुका है। यानी इन इलाकों में भवन निर्माण की छूट है। इसलिए लोग अपनी जरूरत के मुताबिक भवनों का निर्माण करवाते हैं। ऐसे में इन घरों व उनसे जुड़े निर्माण कार्यों पर क्यों दिल्ली पुलिस एतराज करती है? नगर निगम को क्या दिक्कत होती है? ग्रामीण क्षेत्रों के जन-प्रतिनिधियों को इसका विरोध करना चाहिए, ताकि लाल डोरा क्षेत्र की स्वतंत्रता कायम रहे। 
आर एस कौशिक, ककरौला गांव, द्वारका मोड़, नई दिल्ली-59

युवा ताकत की पहचान
युवाओं की भूमिका किसी भी राष्ट्र में अहम स्थान रखती है। इन्हें बाजार ने एक स्नोत के रूप में, तो राष्ट्र व समाज ने एक सजग शक्ति के तौर पर पहचान दी है। परंतु दर्शन-चिंतन के क्षेत्र में अब भी युवाओं की भागीदारी न के बराबर है, जबकि देश के पूर्ण विकास के लिए युवा वर्ग को राष्ट्रीय चिंतन पर ध्यान देना होगा। बीते साल में युवा ज्यादा आक्रोशित दिखे। निजी तौर पर मुङो लगता है कि उन्हें सही मार्गदर्शन की जरूरत है। अगर इस दौर में उन्हें सही संगत न मिले, तो वे अपने लक्ष्य से भटक सकते हैं। यह भी सच है कि आज युवाओं का रुख ज्यादा से ज्यादा कारोबारी क्षेत्र में है। वे निजी क्षेत्र में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। केंद्र व राज्यों की कुछ गलत नीतियों के चलते उनकी बड़ी आबादी बेरोजगार है। इस वर्ग को कुछ खास किस्म के लोग आक्रोश व हिंसा की राह पर ले जाना चाहते हैं। इस दिशा में ध्यान देना होगा।
निमित जायसवाल

जल, जंगल और जमीन
जल, जंगल और जमीन, ये वे उपहार हैं, जो कुदरत ने हमें दिए हैं। अब तय हमें करना है कि इन तीनों का उपभोग हमें कैसे करें। इस दिशा में हमारे पूर्वज हमसे ज्यादा सजग व जागरूक थे। उन्होंने जंगलों को काटने का काम नहीं किया, बल्कि और पेड़-पौधे लगाए। इनसे जो उत्पाद मिले, उनका उन लोगों ने इस्तेमाल किया। उन्होंने जल के बहाव को मोड़ने का फैसला नहीं किया, बल्कि नदियों के किनारे अपने घर बसाए। उन्होंने जमीन को इसलिए कुरेदा कि हम अपने पेट भर सकें। लेकिन आज हमलोग इस पर क्रंकीट के जंगल खड़े कर रहे हैं, जबकि सच्चई यही है कि यह तथाकथित विकास हमें विनाश की ओर धकेल रहा है।
सृष्टि सचदेवा, मुखर्जी नगर, दिल्ली

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