DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आनंद के रंग से अपने चैतन्य को विकसित करें

होली की तरह ही जीवन भी रंगों से भरा होना चाहिए, न कि उबाऊ । जब सभी रंग स्पष्ट देखे जाएं, तब वह रंग से भरा है। जब सभी रंग घुल जाते हैं तो वह काला हो जाता है। जीवन में हम विभिन्न भूमिकाएं निभाते हैं। प्रत्येक भूमिका एवं भावना स्पष्ट रूप से परिभाषित होनी चाहिए। अस्पष्ट भावनाएं कष्ट उत्पन्न करती हैं।

होली रंगों का त्योहार है। यह संसार कितना रंगभरा है। प्रकृति की तरह ही हमारी भावनाओं तथा संवेदनाओं का रंगों से संबंध है- क्रोध का लाल, आनंद और जीवंतता के लिए पीला, प्रेम का गुलाबी, नीला विस्तृतता के लिए, शांति के लिए श्वेत, त्याग का केसरिया और ज्ञान का जामुनी। प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फव्वारा है, जो बदलते रहते हैं।

पुराण अनेक सुन्दर उदाहरणों एवं कथाओं से युक्त हैं और यहां होली की एक कथा है। राजा हिरण्यकश्यप चाहता था कि सब उसकी पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भक्त था भगवान विष्णु का, जिनका वह कट्टर शत्रु था। क्रोधित राजा चाहता था कि उसकी बहन होलिका, उसे प्रह्लाद से छुटकारा दिलाए। अग्नि को सहन करने की शक्ति से युक्त होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि के कुंड में बैठी गई। लेकिन होलिका जल गई, प्रह्लाद सुरक्षित रहा।

हिरण्यकश्यप स्थूलता का प्रतीक है। प्रह्लाद भोलेपन, श्रद्धा एवं आनंद की प्रतिमूर्ति है। चेतना को केवल भौतिकता के प्रेम तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता। हिरण्यकश्यप चाहता था कि संपूर्ण आनंद भौतिक संसार से ही प्राप्त हों, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जीवात्मा सदैव सांसारिक वस्तुओं के बन्धन में नहीं रह सकती।
होलिका भूतकाल की बोझिलता की प्रतिनिधि है, जो प्रह्लाद के भोलेपन को नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध है। किन्तु प्रह्लाद नारायण की भक्ति में इतनी गहराई से स्थित है कि अपने सभी पुराने संस्कारों को, प्रभावों को मिटा देता है और आनंद खिल उठता है नये रंगों के साथ! जीवन एक उत्सव बन जाता है। अतीत की छाप को मिटा कर आप नई शुरुआत के लिए उद्यत होते हैं। आपकी भावनाएं अग्नि की तरह आप को जलाती हैं, किन्तु जब वह रंगों की फुहार-सी हों, तो आप के जीवन में रंग भर देती हैं। अज्ञानता में भावनाएं कष्टकारी हैं, ज्ञान में यही भावनाएं जीवन के भिन्न रंग हैं।

होली की तरह ही जीवन भी रंगों से भरा होना चाहिए, न कि उबाऊ। जब सभी रंग स्पष्ट देखे जाएं, तब वह रंग से भरा है। जब सभी रंग घुल जाते हैं तो वह काला हो जाता है। जीवन में हम विभिन्न भूमिकाएं निभाते हैं। प्रत्येक भूमिका एवं भावना स्पष्ट रूप से परिभाषित होनी चाहिए। अस्पष्ट भावनाएं कष्ट उत्पन्न करती हैं। जब आप एक पिता हैं, आपको पिता का पात्र निभाना है। कार्यस्थल पर आप पिता नहीं हो सकते! जब आप जीवन की विभिन्न भूमिकाओं को मिश्रित करते हैं, तब आप से गलतियां होनी शुरू होती हैं। आप अपने जीवन में जो भी पात्र निभा रहे हैं, पूर्ण रूप से उस ही में हों। विविधता में समन्वयता जीवन को अधिक जीवंत एवं रंग भरा बनाती है।

जीवन में आप आनंद का जो भी अनुभव करते हैं, वह आप को स्वयं से ही प्राप्त होता है। जब आप वह सब छोड़ कर शांत हो जाते हैं, जिसे आपने जकड़ा हुआ है, तब यह ध्यान कहलाता है। ध्यान कोई क्रिया नहीं है। यह कुछ भी नहीं करने की कला है। ध्यान में आपको गहरी नींद से भी अधिक विश्रम मिलता है, क्योंकि आप सभी इच्छाओं के पार होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है। यह मस्तिष्क शरीर तंत्र को पुनर्जीवन देने के समान है। उत्सव चेतना का स्वभाव है तथा वह उत्सव जो मौन से उत्पन्न होता है, वह ही वास्तविक है। यदि उत्सव के साथ पवित्रता को जोड़ दिया जाए तो वह पूर्ण हो जाता है। केवल शरीर तथा मन ही उत्सव नहीं मनाता, बल्कि चेतना भी उत्सव मनाती है तथा उस स्थिति में जीवन रंग युक्त हो जाता है ।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आनंद के रंग से अपने चैतन्य को विकसित करें