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‘दूसरों पर उपकार करना ही पुण्य है’

संत तुकाराम की गणना कबीर, सूर, मीरा आदि भक्तों में की जाती है। इनका जन्म पुणे के देहू गांव में एक महाजन परिवार में हुआ था। साधारण शिक्षा के बाद ये पिता के साथ व्यवसाय में लग गए, किंतु 18 वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत हो गया। इसी समय महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा। ये उस समय तीर्थयात्रा पर निकले थे। घर आने पर देखा कि इनका व्यापार चौपट हो गया है। अकाल में इनकी पहली पत्नी, मां और बड़ा पुत्र भी चल बसे। अभाव और परेशानी का भयंकर दौर शुरू हो गया। इनकी दूसरी पत्नी धनी परिवार की पुत्री और बड़ी कर्कशा थी। तुकाराम का मन विट्ठल के भजन गाने में लगता था और पत्नी दिन-रात ताने देती थी। ये इतने ध्यानमग्न रहते थे कि एक बार किसी का सामान बैलगाड़ी में लादकर पहुंचाने जा रहे थे। पहुंचने पर देखा कि गाड़ी में लदी बोरियां रास्ते में ही गायब हो गई हैं।

इसी प्रकार धन वसूल करके घर लौटते समय एक गरीब ब्राह्मण की करुण कथा सुनकर सारा रुपया उसे दे दिया। पारिवारिक कलह से तंग आकर तुकाराम नारायणी नदी के उत्तर में मानतीर्थ पर्वत पर जा बैठे और भगवत् भजन करने लगे। इससे घबराकर पत्नी ने देवर को भेजकर इन्हें घर बुलाया और अपने ढंग से रहने की छूट दे दी। अब तुकाराम ने ‘अभंग’ रचकर कीर्तन आरंभ कर दिया। इसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। कुछ लोग विरोध भी करने लगे। कहते हैं, रामेश्वर भट्ट नामक कन्नड़ ब्राह्मण ने कहा कि तुम अभंग रचकर और कीर्तन करके लोगों को वैदिक धर्म के विरुद्ध बहकाते हो। तुम यह काम बंद कर दो। संत तुकाराम ने रामेश्वर भट्ट से जाकर कहा कि मैं तो विट्ठल की आज्ञा से कविता करता हूं। आप कहते हैं तो मैं यह काम बंद कर दूंगा। यह कहते हुए उन्होंने स्वरचित अभंगों का बस्ता नदी में डुबा दिया। किंतु 13 दिन बाद लोगों ने देखा कि जब तुकाराम ध्यान में बैठे थे, उनका बस्ता सूखा ही नदी के ऊपर तैर रहा है। यह सुनकर रामेश्वर भट्ट भी उनका शिष्य बन गया। भीगनाथ की पहाड़ी के ऊपर पंद्रह दिन एकांतवास करके भगवान के ध्यान में तल्लीन रहे और उनका साक्षात्कार किया।

भगवान पांडुरंग ने बालाजी चैतन्य रूप में आकर स्वप्न में दर्शन दिए और विक्रमी संवत् 1689 में बालाजी चैतन्य से तुकाराम जी ने दीक्षा ग्रहण की। तुकाराम जी अपने अनुभव से कहते हैं, ‘‘नाम स्मरण में वह शक्ति है कि अदृश्य भी दिख जाता है और न समझने वाला भी समझ में आ जाता है। अबोल को वाचा मिल जाती है और सभी अलभ्य लाभ घर बैठे ही प्राप्त हो जाते हैं।’’ तुकाराम कर्मयोगी और ज्ञानी थे, इसलिए इनकी वाणी में प्रेम रस भरा हुआ था। तुकाराम जी का उपदेश था- दूसरों के ऊपर उपकार करना ही पुण्य है। मुख से भगवान का नाम लेना ही सबसे बड़ा लाभ है। समस्त में भगवान को देखना ही ईश्वर दर्शन है व अहंभाव ही अदर्शन है। जो सब कुछ भगवान को अर्पण कर देता है, वही उदार है। जो अंदर में मलिनता रखता है, वही कंजूस है। तुकाराम ने सदेह बैकुण्ठ में जाने का निश्चय किया था। विक्रमी संवत् 1706 की चैत्र कृष्ण द्वितीया दिन शनिवार सूर्योदय के पश्चात् 41 वर्ष की आयु में संत तुकाराम ने प्रयाण किया। दूज के दिन वह अन्तर्ध्यान हुए, पंचमी को इनका करताल, तंबूरा और कम्बल मिला। उसी समय से प्रति वर्ष इनके जन्म स्थान देहू में चैत्र कृष्ण दूज की पंचमी तक बड़ी धूमधाम से महोत्सव मनाया जाता है। अभंग छंद में रचित तुकाराम के लगभग 4000 पद प्राप्त हैं। इनकी रचनाओं में-‘ज्ञानेश्वरी’ और ‘एकनामी भागवत’ की छाप दिखाई देती है। मराठीभाषी इनका पाठ बहुत सम्मान के साथ करते हैं। 42 वर्ष की उम्र में संत तुकाराम का निर्वाण हो गया। इनका देहू ग्राम तीर्थ माना जाता है। प्रतिवर्ष 5 दिन तक चैत्र प्रतिपदा से मेला लगता है।                        

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