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द्वापर युग की श्यामा श्याम की होली हुई जीवंत

 मथुरा। निज संवाददाता

जन्मस्थान का वातावरण होली के रंग में ऐसा रंगा कि दर्शक भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस आनंद को लेने से रोक नहीं सके। 150 फुट ऊंचे शिखर से होती रंग-बिरेंगे गुलाल की वर्षा से परिसर इंद्रधनुषी बन गया। लग रहा था कि नीलांबर से रंग-बिरंगी बरसात हो रही है। जन्मस्थान पर वातावरण का ध्यान रखकर होली का आयोजन किया गया। पर्यावरण की रक्षा के लिए योगीराज श्रीकृष्ण ने ही संदेश दिया था। उसी को ध्यान में रखकर यह आयोजन किया जा रहा था। रसिया और ब्रज की विभिन्न प्रकार की होलियों का प्रस्तुतीकरण किया गया। चरकुला नृत्य सभी को आश्चर्यचकित कर रहा था। फूलों कही होली इतनी जीवंत थी कि महसूस हो रहा था कि श्यामश्याम की होली जन्मस्थान पर ही हो रही है।

सबसे सुखद पल तो यह थी कि श्यामाश्याम ने इस होली में ब्रजवासियों को भी शामिल कर लिया था। जिस पर भी पुष्प का प्रसाद पड़ता वह अपने को धन्य समझता और जिस पर नहीं पड़ता वह दुबारा इसे पाने के लिए मचल उठता। फूलों की होली के साथ लठामार होली की शुरूआत हो गयी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान का वातावरण मनोहारी हो गया। रावल और मथुरा के हुरियारों पर गोपियां घूंघट की ओट से लाठियों से प्रहार कर रहीं थीं। हुरियारे अपना बचाव कर रहे थे। स्वर गूंज रहे थे आज ब्रज में होली रे रसिया। हुरियारे भी इन प्रेमपगीं लाठियों को ढाल से रोककर आंनदित हो रहे थे।

प्रिया-प्रियतम की इस प्रेम रसमयी होली को भव्य एवं दिव्य रूप देख दर्शक आनंदित हो रहे थे। पुष्पवर्षा एवं गुलाल के मध्य ढोल-नगाड़ाें की थाप पर लठामार होली की अनुपम छटा बिखर रही थी। गुलाल, पुष्प की पंखुडिम्यों की वर्षा को देख मन में हिलोरे उठ रहे थे। इससे परिसर की छटा मनोहारी एवं दिव्य हो गयी।

गुलाल की बरसात से कोई भी श्रद्धालु बच नहीं सका। श्रृद्धा,आस्था, गालियों की मनुहार के बीच लाठियों की तड़तड़ाहट के साथ बजते रसियों ने हर किसी को झूमने को मजबूर कर दिया। उल्लास का ऐसा वातावरण छाया कि कोई भी आज ब्रज में होली रे रसिया गाने से नहीं रोक सका। धीरे-धीरे सायं हो चली। पर मन था कि मचल रहा था। राधा-कृष्ण की भक्ति से बहार निकलने का नाम नहीं ले रहा था। रात हो चली। कार्यक्रम समापन की ओर बढ़ रहा था। श्रद्धालुओं को घर भी जाना था। ठाकुर जी से अगली बार फिर होली खेलने का वायदा कर श्रृद्धालु विदा हुए।

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