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नई राजनीति और पुरानी राजनीति

पूरा देश दम साधे उत्तर प्रदेश की ओर देख रहा है। बड़े दिनों बाद कोई ऐसा चुनाव हुआ है, जिसने इस कदर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। इस चुनाव के दो चेहरे याद रखने लायक हैं। एक चेहरा अखिलेश यादव का है, दूसरा राहुल गांधी का। राहुल गांधी ने साल 2007 के बाद से ही उत्तर प्रदेश को अपना मिशन बना रखा है। राहुल को लगता है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जिंदा किए बगैर केंद्र की राजनीति में पार्टी को कभी अपने बल पर बहुमत नहीं मिल पाएगा और वर्ष 1989 के पहले की गौरवशाली परंपरा कभी वापस नहीं आ पाएगी।

1989 के पहले केंद्र में हमेशा कांग्रेस की अपने बल पर सरकार बनी। लेकिन 1989 के चुनावों में वीपी सिंह के बोफोर्सवाद और बाद में मंडलवाद ने कांग्रेस की कमर तोड़ दी। बीजेपी के अयोध्यावाद ने भी कांग्रेस को कमजोर किया, लेकिन कांग्रेस का बुनियादी नुकसान मंडलवाद की वजह से ही हुआ। पिछड़ों और दलितों में मंडलवाद की वजह से जो चेतना जगी, उसका तोड़ कांग्रेस नेतृत्व कभी खोज नहीं पाया। दलित कांग्रेस से छिटका और मुसलमान नाराज हुआ, नतीजतन यूपी से पार्टी का सफाया हो गया। 

इस चुनाव में राहुल गांधी ने अपने खोए जनाधार को पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया। वह जानते हैं कि मायावती जब तक हैं, तब तक कांग्रेस के पास दलित आएंगे नहीं। शुरू से लेकर अंत तक वह मायावती पर हमले करते गए और उन्हें दलित चेतना विरोधी साबित करने की कोशिश की। एक ऐसी नेता, जिसने दलित राजनीति करके ही लोगों को अपना बनाया।

राहुल के साथ दिक्कत यह हुई कि वह अपने थके नेताओं की चकाचौंध में आधुनिक राजनीति का दामन छोड़कर फिर उसी परंपरागत राजनीति के साथ हो लिए, जिसका वह साल 2009 के संसदीय चुनाव तक जमकर विरोध करते थे। बदलते हिन्दुस्तान के साथ देश की राजनीति बदली है, यह लगातार कहा जा रहा है। अब चुनाव जाति व धर्म पर कम, रोटी, कपड़ा व मकान पर ज्यादा लड़े जा रहे हैं।

सरकारों का बनना और बिगड़ना अब विकास पर निर्भर कर रहा है। बिहार में नीतीश कुमार, दिल्ली में शीला दीक्षित, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह, गुजरात में नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान इसके उदाहरण हैं। राहुल ने यह तो कहा कि यूपी में हाथी पैसा खा जाता है, लेकिन उनका पूरा ध्यान मुस्लिम वोटरों के ध्रुवीकरण पर लगा रहा। ऐन चुनाव के वक्त बटला हाउस का मुद्दा सामने आना और मुस्लिम आरक्षण का लॉलीपॉप इसी रणनीति का हिस्सा था। कभी जाति और धर्म का पोलराइजेशन करके वोट खरीदे जा सकते थे, पर अब लोग इन मुद्दों से थक गए हैं, वे ज्यादा समझदार हो गए हैं। राहुल ने यहां गलती की।

उन्हें प्रदेश में कांग्रेस को री-इनवेंट करना था, वह पिटी-पिटाई लीक पर कांग्रेस को लेकर चले, जिस खेल में वह मुलायम सिंह, मायावती व बीजेपी को कभी मात नहीं दे सकते। कांग्रेस की ताकत थी, सभी तबकों को साथ लेकर चलना। 1990 के दशक में कांग्रेस क्यों गिरी, क्योंकि वह अयोध्या और मंडल पर, यानी जातिवाद के मसले पर कोई साफ स्टैंड नहीं ले पाई। इसलिए उससे जातियां और धर्म दूर होते चले गए।

राहुल के विपरीत अखिलेश ने समाजवादी पार्टी को री-इनवेंट किया। मुलायम सिंह यादव को 2007 में करारी हार इसलिए मिली कि उनकी सरकार पिछड़ी जातियों के बीच यादवों की पार्टी बन गई, गुंडों की बारात खड़ी हो गई। बदलते भारत में अंग्रेजी और कंप्यूटर का विरोध प्रमुख हो गया। लोगों ने समाजवादी पार्टी को जड़ पार्टी मान लिया, जो 21वीं सदी में 19वीं सदी की बातें करती है। लोगों ने रिजेक्ट कर दिया।

मुलायम सिंह यादव को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने इस चुनाव का सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेला। बजाय खुद के अपने बेटे को आगे किया। नए हिन्दुस्तानियों की नजर में मुलायम की गंवार राजनीति को अखिलेश के शहरी आधुनिक चेहरे ने ढक दिया। अखिलेश के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने अपने को पुरानी छवि से बाहर निकालने की कामयाब कोशिश की है। उसने चार महत्वपूर्ण काम किए। एक, कल्याण सिंह से किनारा कर लिया। अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

कल्याण सिंह और अमर सिंह पुराने जमाने की राजनीति के प्रतीक हैं। पुराने प्रतीक गए, अखिलेश में समाजवादी पार्टी ने नया प्रतीक गढ़ लिया। गुंडों और बदमाशों की राजनीति को डीपी यादव को पार्टी में शामिल करने से मना करके बदल दिया। ये संदेश दिया कि पार्टी बदल गई है। वह जीतने के लिए गुंडों का स्वागत नहीं करेगी और न ही सरकार में आने के बाद गुंडों को खुली छूट देगी, भले ही वे गुंडे यादव ही क्यों न हों। इसके अलावा मुलायम सिंह यादव के अंग्रेजी विरोध को पूरी तरह से त्याग दिया।

अखिलेश राहुल गांधी जैसा यश भले ही न रखते हों, लेकिन पढ़े-लिखे, समझदार और मासूम लगते हैं। राहुल का चेहरा शुष्क लगता है। उनके करीब आना मुश्किल है, वह ‘अन-अप्रोचेबल’ लगते हैं, जबकि अखिलेश यादव पड़ोसी बालक की तरह हैं, जिनसे कोई भी कभी बात कर सकता है। अखिलेश उस हिन्दुस्तानी की तरह हैं, जो जानता है कि अंग्रेजी पढ़े और बोले बिना जिंदगी में तरक्की नहीं की जा सकती। राहुल बनना असंभव है, अखिलेश बनना आसान।

अखिलेश की अप्रोचेबेलिटी ने जादू किया। इसके अलावा लैपटॉप देने की नीति ने लोगों की नई आकांक्षाओं को नया सपना दिखाया। आम युवा, कॉलेज और यूनिवर्सिटी जाने वाला युवा, गरीब बेरोजगार युवा के लिए टेक्नोलॉजी नया अजूबा है। वह जाति के बंधन में भले ही बंधा हो, लेकिन वह अब लैपटॉप और टैबलेट वाला कूल-डूड बनना चाहता है। आईफोन और आईपैड का इस्तेमाल सिर्फ दिल्ली और मुंबई वाले ही क्यों करें, वो क्यों नहीं?

राहुल गांधी के साथ दिक्कत यह हो गई कि जब लोग उनसे नई राजनीति की उम्मीद कर रहे थे, वह पुरानी राजनीति मे फंस गए, और अखिलेश जिनसे पुरानी राजनीति की आशंका थी, वह नई राजनीति  के प्रवक्ता हो गए। नए और पुराने के खेल में राहुल पिछड़ गए और अखिलेश बाजी मारते नजर आते हैं। पुरानी राजनीति ने विकास के पैमाने पर यूपी का बंटाधार किया है, नई राजनीति ही उसे उबारेगी, यह विश्वास ही यूपी के चुनावों का नया जादू है। यह नयापन ही है यूपी की नई आशा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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