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चीन के आगे निकलने पर पीछे छूटे सवाल

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोई नई बात नहीं कही। यह काफी समय से कहा जा रहा है कि अन्य क्षेत्रों की ही तरह चीन विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी हमसे काफी आगे निकल गया है। यह सिर्फ कहा ही नहीं जा रहा, आंकड़े भी यही कहते हैं। ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल 15 लाख से अधिक शोधपत्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रकाशित हो रहे हैं। अमेरिका इसमें अव्वल है, चीन चौथे स्थान पर है, जबकि भारत का नंबर 12वां है। साल में बमुश्किल 53,000 शोध पत्र भारत में प्रकाशित हो रहे हैं। दूसरी ओर चीन में यह आंकड़ा लगभग पांच गुना है और वहां पर हर दो मिनट में एक शोध पत्र प्रकाशित हो रहा है।

इतना ही नहीं, अगर शोध व विकास पर दुनिया भर में हो रहे खर्च के हिसाब को देखें, तो भारत कहीं नहीं ठहरता। विश्व भर में इस पर हर साल 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो रहे हैं, जो हमारे सकल घरेलू उत्पाद के आधे के बराबर है। भारत में इसका 50वां हिस्सा भी खर्च नहीं हो रहा। दूसरी ओर चीन ने अपना खजाना वैज्ञानिक समुदाय के लिए खोल दिया है। वहां हर साल पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च शोध और विकास पर किया जा रहा है। यह ठीक है कि एक दशक पहले चीन और हमारी वैज्ञानिक तरक्की में ज्यादा फासला नहीं था।

सीएसआईआर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी ऐंड डेवलपमेंट स्टडीज ने इसका एक आकलन किया है। उसका कहना है कि 1998 में भारत से कुल 21,652 शोध पत्र, जबकि चीन से 36,512 प्रकाशित हुए थे। फासला करीब 15,000 शोध पत्रों का था। पर आने वाले वर्षों में चीन ने तरक्की की रफ्तार पकड़ी और अंतर बढ़ता गया। 2008 तक चीन में जहां 2,36,014 शोध पत्र प्रकाशित हुए, वहीं भारत में यह आंकड़ा 52,126 ही था।

चौंकाने वाली बात यह है कि यह फासला उस दौर में सर्वाधिक बढ़ा, जब हमारी अर्थव्यवस्था ने लगातार पांच बरस तक अभूतपूर्व नौ फीसदी की वृद्धि दर्ज की थी। विशेषज्ञों ने इस विकास के समावेशी होने पर सवाल उठाए हैं। आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के चक्कर में विज्ञान को तो जैसे भुला ही दिया गया। शायद शोध उस समय हमारी प्राथमिकताओं में नहीं था।

लेकिन चीन ने यह गलती नहीं की। उसने नीति नियोजन और धन का ऐसा तालमेल बनाया, जिससे वह 2020 तक जीडीपी की ढाई फीसदी धनराशि अनुसंधान और विकास पर खर्च करने का लक्ष्य हासिल कर सके। उसने 1999 से ही शोध और अनुसंधान पर खर्च में हर साल 20 फीसदी का इजाफा किया। इसके अलावा चीन ने अपने वैज्ञानिकों को विदेश से बुलाने का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम भी शुरू किया है। भारत के पास इस दौरान इतनी बड़ी रणनीति कभी नहीं रही। इसलिए विज्ञान में चीन से पिछड़ना कोई हैरत की बात नहीं।

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