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हम सबकी परीक्षा की घड़ी

हर दिन एक न एक शादी। सज-धजकर जाना ही जाना। कौन कहे कि आज जंगल अधिक सुरक्षित हैं कि शहर। पत्नी के गहने और रात का सफर। जान हथेली पर। रोज इस सड़क पर एक न एक खूनी घटना घटती है। घर में खाने के लाले, उस पर हर विवाह में लिफाफा देने की अनिवार्यता। मुश्किलें अकेले कब आती हैं? पप्पू की परीक्षा है कि हमारी, कहना कठिन है। उनके स्कूल में दाखिले के समय भी हमें ऐसा ही लगा था। अपन तय नहीं कर पाए कि प्रिंसिपल महोदया ने हमारी अंग्रेजी बोलने की योग्यता परखी थी कि पप्पू के अक्षर-ज्ञान की। उस दिन हम सफल रहे थे। इस बार तो ‘बोर्ड’ है। जाने क्या हो?

गनीमत है। भविष्य औरों का भी अनिश्चित है। तभी तो राष्ट्रीय नेता, कार, हेलीकॉप्टर, और तोता रटंत की महती जनसेवा संपन्न कर, सुस्ता रहे हैं। स्थानीय ‘नर्वस’ हैं। परीक्षा के नतीजे की घड़ी आने वाली है। कुछ की आस विकास के वायदों पर है, कुछ की जात पर, तो कइयों की आरक्षण के जाल पर। इतनी बार वोट की मछली इसी चारे-चुग्गे से फंसी है, तो इस बार क्यों नहीं? सब सशंकित हैं। वोट-प्रतिशत क्यों बढ़ा है? अलग-अलग कयास हैं।

युवा मतदाताओं की क्या प्रतिक्रिया है? क्या उसका घुट्टी में घुले जातीय जहर से मुक्त रहना मुमकिन है? वोट बढ़ना क्या सत्ता-विरोधी रुझान है, या किसी अनपेक्षित गठजोड़ का? विद्वानों के मौज हैं। हर टीवी चैनल पर उनका थोबड़ा कभी बहस में, कहीं विमर्श में झलक जाता है। जुबानी जमा-खर्च की कमाई यही है। पानवाला असली चुनावी-विशेषज्ञ है। टीवी चैनल उसे बुलाएं न बुलाएं। ग्राहकों को चूना लगाते-लगाते, वह बताता है कि कोई पप्पू पास हो या फेल, फर्क क्या पड़ना है? पिछले विधायक ने कहा था कि सामने की सड़क बनवाएगा। उसने बनवाई भी। बनते-बनते गड्ढ़े उभर आए।

बड़ी संक्रामक है भ्रष्टाचार की बीमारी, अब हर तरह के विकास को लग गई है। सब इसी मर्ज से ग्रस्त हैं। सियासत समाज का दर्पण है। नेता कौन आसमान से टपका है। वह भी इसी जमीन का खर-पतवार है। हमें लगता है कि सरकार और संस्थाएं हर पल समय की कसौटी पर कसी जा रही हैं। एक का नतीजा आते-आते दूसरा इम्तिहान सिर पर आ जाता है।
गोपाल चतुर्वेदी

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