DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मीटिंग में बंद दिमाग

क्या आपको किसी मीटिंग से बाहर निकलते हुए ऐसा लगा है कि आपके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है? अगर ऐसा हुआ है, तो आपको गलत नहीं लगा है, बल्कि अगर कोई व्यक्ति यह कहता है कि किसी मीटिंग से उसे दिमागी खुराक मिली है, तो आप उसे शक से देख सकते हैं।

वैज्ञानिकों का यह कहना है कि किसी बैठक के बाद उसमें मौजूद लोगों का बुद्धिमत्ता का गुणांक यानी आईक्यू कम हो जाता है। अमेरिका के वर्जीनिया टेक क्रिलोन शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। उन्होंने दो विश्वविद्यालयों के ऐसे छात्रों को चुना, जिनका आईक्यू औसतन 126 था। उन्हें कुछ सवाल हल करने को दिए गए और उनके अंक दर्ज किए गए। उसके बाद उन्हें छोटे-छोटे समूहों में बांट दिया गया और उसके बाद उनकी परीक्षा ली गई और लगातार उनके अंक एक-दूसरे को बताए गए।

यह पाया गया कि समूह में जो परीक्षा ली गई, उसमें ज्यादातर छात्रों का प्रदर्शन काफी खराब हो गया। यह पाया गया कि बहुसंख्य छात्रों की समस्याएं सुलझाने की क्षमता अकेले काम करते वक्त काफी ज्यादा थी, समूह में और प्रतिस्पर्धा में वह क्षमता काफी कम हो गई। इन छात्रों के दिमाग के एमआरआई स्कैन भी लिए गए, जिनसे यह पाया गया कि दिमाग के वे केंद्र, जो समस्याएं सुलझाने या भावनाओं को व्यक्त करने या पुरस्कार पाने में सक्रिय होते हैं, वे सामाजिक दबावों से प्रभावित होते हैं।

वैज्ञानिकों का यह कहना है कि इस विषय पर और ज्यादा शोध करने की जरूरत है कि सामाजिक प्रतिष्ठा का दबाव हमारी प्रतिभा को कैसे दबाता है। दरअसल जब हम किसी मीटिंग में होते हैं, तो हमारी कोशिश दूसरे की नजर में बेहतर दिखने की होती है। ऐसे में दूसरे लोगों के शब्द या हाव-भाव हमें बहुत प्रभावित करते हैं। यह विचार भी हमें प्रभावित करता है कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोच रहे हैं या वे हमारी कमजोरियां तो नहीं भांप रहे हैं। इन तमाम बातों का असर हमारी बुद्धिमत्ता पर पड़ता है।

इस शोध को करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध से यह भी जाहिर होता है कि अगर हमारे  कामकाज की तुलना दूसरों से की जा रही है, तो यह भी हमारी बुद्धि पर विपरीत असर करता है। जरूरी यह है कि हम यह सोचें कि लगातार प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाकर हम कितनी प्रतिभाओं को कुंद कर रहे हैं। आखिरकार सिर्फ किसी दफ्तर या संस्थान के ही नहीं, बल्कि देश दुनिया के बड़े फैसले भी मीटिंगों के बाद ही होते हैं।

इससे मीटिंग के आदी लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, मीटिंगों का विकल्प नहीं है। यूं भी मीटिंग से दिमाग बंद हो जाने की शिकायत वे लोग करते हैं, जिन्हें सचमुच कोई काम करना होता है। कुछ लोगों का काम ही मीटिंग करना होता है। बहरहाल, इस शोध के निष्कर्ष इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये बताते हैं कि इंसान का दिमाग सबसे ज्यादा क्रियाशील तब होता है, जब उस पर किसी के सामने कुछ साबित करने का दबाव नहीं होता, यानी वह होड़ में कोई काम नहीं करता।

भारत के संदर्भ में यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली में प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है। यह शिकायत भारतीय नौजवानों से आम है कि वे सामान्य कामकाज के लिए बहुत अच्छे हैं, लेकिन जहां कल्पनाशक्ति या नया सोचने का मामला है, वे काफी पीछे हैं। इस बात का ताल्लुक भी शायद हमारी परीक्षाओं में एक-एक अंक के पीछे होने वाली मारामारी से है। वैसे एक बात शोधकर्ताओं ने नहीं लिखी कि मीटिंग का सीधा ताल्लुक सामाजिक और आर्थिक हैसियत के बढ़ने से है। अगर इसके लिए थोड़ा-बहुत आईक्यू का बलिदान करना भी पड़े, तो क्या बुरा है?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मीटिंग में बंद दिमाग