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नदियों को जोड़ने के खतरे

सुप्रीम कोर्ट की तय समय-सीमा के आदेश के मद्देनजर अब हिन्दुस्तान सरकार विवादास्पद नदी जोड़ो परियोजना शुरू करने पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी। इस योजना में 30 नदियों को जोड़ने की बात है। इसमें हिन्दुस्तान के दक्षिण और पूर्वी इलाकों में सिंचाई-व्यवस्था के लिए गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों की धाराओं को मोड़ा जाएगा। हमें इस आदेश ने हैरान किया है।

जिस तरीके से इस परियोजना को आगे बढ़ाने की बात कही गई है, उसमें बांग्लादेश के हितों की बिल्कुल अनदेखी की गई है। हम हिन्दुस्तान के पड़ोसी मुल्क हैं और दोनों देशों में बहने वाली नदियों में हमारी अहम साझीदारी है। पर अफसोस की बात है कि इस प्रक्रिया के किसी भी चरण में बांग्लादेश से सलाह नहीं ली गई, जो पड़ोसी के साथ बेहतर संबंधों के बुनियादी कायदे के उलट है।

यह अंतरराष्ट्रीय परंपरा है कि जब भी एक से ज्यादा मुल्कों में बहने वाली नदियों की धारा को मोड़ने का फैसला लिया जाता है, तो पड़ोसी मुल्क को भरोसे में लिया जाता है। इसलिए हम हिन्दुस्तान से अनुरोध करते हैं कि वह अपनी पूरी योजना की जानकारी हमसे साझा करे और बांग्लादेश समेत उन मुल्कों से संपर्क करे, जिनकी नदी घाटियां आपस में जुड़ी हैं।

जहां तक हम समझते हैं, अगर नदी जोड़ो परियोजना पूरी हुई, तो इससे बांग्लादेश में अभूतपूर्व पर्यावरणीय तबाही आएगी। तीस्ता समेत कई नदियों पर इस परियोजना का बुरा असर पड़ेगा। नदियों में खारेपन का स्तर बढ़ जाएगा, जिससे खेतिहर जमीन बर्बाद होंगे। सर्फेस वॉटर सिस्टम खत्म हो जाएगा। पद्मा और मेघना नदियों के दोनों किनारों की बसावट के खत्म होने से करीब तीन करोड़ लोगों की आजीविका पर असर पड़ेगा। यहां तक कि दुनिया का सबसे बड़ा सदाबहार जंगल सुंदरबन के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगेगा।

नदी जोड़ो परियोजना की इस भयावहता को देखने की जरूरत है। खास तौर पर इससे निचले तटवर्ती मुल्क  सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। हमारी मांग है कि इस योजना से जुड़े तमाम अध्ययन हमें तत्काल उपलब्ध कराए जाएं, ताकि हम फैसला कर सकें कि बिना हमारे हितों को नुकसान पहुंचाए इस योजना को कैसे अमल में लाया जा सकता है।
द डेली स्टार, बांग्लादेश

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