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अस्वीकार्य बयान

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा का ‘सेक्सी’ शब्द संबंधी बयान बेहद बचकाना है। सच तो यह है कि सेक्सी शब्द का औचित्य बताने वाली महिला को यह पद देना ही अनुचित लग रहा है। अब जब उनके इस विवादास्पद बयान पर हंगामा खड़ा हुआ, तो वह एक और बचकाना बयान देकर अपना बचाव कर रही हैं कि मैं यूथ के बीच बोल रही थी। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि यूथ हो या समाज का कोई भी वर्ग, जो गलत है, वह सभी के लिए गलत है? इसलिए ममता शर्मा को या तो अपने इस बयान पर माफी मांगनी चाहिए या फिर यह प्रतिष्ठित पद त्याग देना चाहिए। आखिर उनसे किसी पीड़ित लड़की को न्याय दिलाने की उम्मीद भी कैसे की जाएगी?
वंदना शर्मा, गौतम विहार, दिल्ली

कहां गई टीम अन्ना
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की खटिया खड़ी करने की धमकी देने वाली टीम अन्ना इन दिनों कहीं नजर नहीं आ रही। बाबा रामदेव भी उत्तराखंड चुनावों के बाद पस्त पड़ गए और अपनी दुकानदारी संभालने में जुट गए। आखिर ऐसा क्या हुआ, जो ये बयानवीर अप्रासंगिक-सा लगने लगे? दरअसल, भावनाओं के ज्वार पर बहुत लंबी सवारी नहीं की जा सकती। लोगों का जोश जब शांत हुआ और उन्होंने देखा कि रामराज्य के सपने दिखाने वाली टीम अन्ना के सदस्य भी उन्हीं गुण-दोषों के पुतले हैं, तो लोग समझ गए कि अपने विवेक पर रहा जाए। इसीलिए इन चुनावों में केजरीवाल और सिसौदिया कहीं गए भी, तो 200 से ज्यादा लोग नहीं जुटा सके। इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी का चाहे जो भी हश्र हो, हालत तो पतली इन स्वयंभू समाजसेवकों की ही हुई है।
मुकुल सिंह, वेस्ट गुरु अंगद नगर, दिल्ली-92

यह कैसा रवैया
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में आयोजित अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में ऐसे लाखों अभ्यर्थी फेल हो गए, जो शिक्षण कार्य को खेल समझ रहे थे या फिर किन्हीं वजहों से परीक्षा ठीक से नहीं दे पाए। अब इनमें से कुछ अभ्यर्थी खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की कहावत को चरितार्थ करने में लगे हुए हैं। वे शिक्षकों की भर्ती में बाधा उत्पन्न कर रहे है। उत्तर प्रदेश में टीईटी को लेकर सैकड़ों की संख्या में याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। जाहिर है, पात्रता परीक्षा में विफल हुए लोग ये याचिकाएं डाल रहे हैं। ऐसे लोग परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर पूरी भर्ती प्रक्रिया को ही बाधित करना चाहते हैं, ताकि सरकार टीईटी को रद्द करके भर्ती प्रक्रिया के स्वरूप को ही परिवर्तित कर दे। यदि एक बार विघ्नसंतोषी लोग अपने इरादे में कामयाब हुए,   तो फिर हर परीक्षा के साथ ऐसा हो सकता है।
जितेंद्र कुमार जौली, अंबेडकर नगर, मुरादाबाद
jkjolly@yahoo.co.in

जाति बनाम विकास
आजादी के छह दशकों के बाद भी देशें के अनेक गांव आज भी बिजली, पानी, सड़क, चिकित्सा जैसी मूलभत सुविधाओं से वंचित हैं। उस देश में चुनाव का आधार विकास न होकर जाति, धर्म और क्षेत्रीयता बन जाए, तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात और क्या होगी? जनता को जातिवादी गणित में फंसाकर नेता विकास के मुद्दों को पीछे धकेलते रहे हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक पार्टियां विकास नहीं, जाति के नाम पर वोटरों को रिझाने के प्रयास करती रहीं। सभी दलों ने अपने प्रत्याशियों की योग्यता को शिक्षा व चरित्र पर नहीं, बल्कि जाति की कसौटी पर पहले कसा। इसीलिए अब वक्त आ गया है कि इस तरह की शर्मनाक कवायद पर निर्णायक रोक लगे।
अनीस अहमद शीराजी
shirazi80@gmail.com

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