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रोके न रुकेगी आकाश की उड़ान

स्वदेश निर्मित ‘आकाश टैबलेट’ किफायती तो जरूर है, लेकिन कुछ धीमा भी है। इसके नए संस्करण से उम्मीद लगाई जा रही है कि वह तेज रफ्तार से चलेगा और अपने मूल संस्करण जैसा ही किफायती भी होगा। आकाश को बनाने और उसके वितरण संबंधी अब तक की क्या कहानी रही है, बता रहे हैं बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत के किसी तकनीकी उत्पाद को आज तक ऐसी विश्वव्यापी पब्लिसिटी नहीं मिली थी। एक साथ आलोचना और प्रशंसा झेल रहे दुनिया के सबसे सस्ते टैबलेट कंप्यूटर ‘आकाश’ की हाइप अब तक नहीं थमी है। लाखों टैबलेट बुक होने के बाद भी लोग इसके मूल निर्माता डेटाविंड की वेबसाइट पर जाकर ऑर्डर दिए जा रहे हैं। कंपनी मांग पूरी करने की स्थिति में नहीं है और लोगों से दो-दो महीने इंतजार करने का आग्रह किया जा रहा है।

आकाश को जितनी तारीफ और चर्चा मिली है, उतने ही विवाद और आलोचनाएं भी इसके हिस्से में आए हैं। कभी इसकी तकनीकी सीमाओं तो कभी डेटाविंड और भारत सरकार के मंत्रालयों व संस्थानों के बीच पैदा हुए खिंचाव ने इस अनूठी राष्ट्रीय उपलब्धि से प्रफुल्लित प्रशंसकों को निराश किया है।

ईमानदारी से कहूं तो ‘आकाश’ को पहली बार देखना और इस्तेमाल करना मेरे लिए आमतौर पर एक सुखद अनुभव रहा। सात इंच की स्क्रीन वाला, गूगल एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम 2.2 से लैस, साढ़े तीन सौ ग्राम का टैबलेट कंप्यूटर और महज 2,999 रुपए में खरीद पाना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। ऐसा तब, जबकि अनाम चीनी कंपनियों के इससे कहीं कम क्षमता वाले टैबलेट कंप्यूटर छह हजार रुपए में मिल रहे थे।

कोई सरकारी परियोजना इस तरह का उत्पाद साकार कर सकती है, इस बात पर यकीन कर पाना मुश्किल था। जब एक लो-ग्रेड मोबाइल फोन तक 1700 रुपए में नहीं मिलता, इतनी ही रकम में यहां एक अच्छी-खासी कंप्यूटिंग डिवाइस छात्रों को मुहैया कराई जा रही थी। अगर आप 1700 के ‘आकाश’ की तुलना बीस गुना कीमत वाले आई-पैड से करेंगे तो पचासों कमियां गिना देंगे, लेकिन अगर उसे दुगनी-तिगुनी कीमत वाली किसी डिवाइस के मुकाबले में रख कर देखेंगे तो मानना पड़ेगा कि ‘आकाश’ कोई हवाई उत्पाद नहीं है।

तकनीकी पक्ष
किसी भी उत्पाद के पहले संस्करण में कुछ कमियां अस्वाभाविक नहीं होतीं, खासकर तब जबकि आर्थिक सीमाओं के भीतर रहना उसकी मजबूरी हो। आकाश की जितने पैमानों पर आलोचना की जाती रही है, उनमें से ज्यादातर इन्हीं आर्थिक सीमाओं की बदौलत है, मसलन - उसकी रेजिस्टिव टच स्क्रीन (जिसमें स्क्रीन को उंगली से जोर से दबाने की जरूरत पड़ती है), अपेक्षाकृत कम क्षमता (366 मेगाहट्र्ज) का माइक्रोप्रोसेसर, कम रैम (256 एमबी) और एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम का शुरुआती संस्करण (एंड्रॉयड 2.2)।

आकाश की धीमी रफ्तार के लिए ये माइक्रोप्रोसेसर, रैम और ऑपरेटिंग सिस्टम ही जिम्मेदार हैं और उनके धीमेपन के लिए जिम्मेदार है उसकी कम कीमत। एंड्रॉयड तो फ्री ऑपरेटिंग सिस्टम है, लेकिन उसके नए वर्जन को इन्स्टॉल करने के लिए बेहतर प्रोसेसर, ज्यादा रैम और ज्यादा एक्सटर्नल स्टोरेज चाहिए। जाहिर है, निर्माताओं को कीमत और फीचर्स के बीच में से किसी एक चीज का चुनाव करना था और उन्होंने स्वाभाविक कारणों से कीमत को वरीयता दी।

जिन छात्रों को ‘आकाश’ से लाभान्वित होना है, उनमें से ज्यादातर के पास आज किसी भी तरह की कंप्यूटिंग डिवाइस नहीं है। कीमत को पहुंच में बनाए रखते हुए उन्हें कम्प्यूटिंग पावर से लैस करना स्पीड और आधुनिक फीचर्स से ज्यादा बड़ी प्राथमिकता है। आकाश की आलोचना करते हुए हम उसे एक आधुनिक कंप्यूटर-टेलीकॉम यूजर की जरूरतों के पैमाने पर तौलते हैं, जबकि इसका निर्माण उनके लिए किया ही नहीं गया। मकसद है, छात्र कंप्यूटर तथा इंटरनेट से तालमेल बिठाएं, पढ़ाई-लिखाई सूचना प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों से लाभान्वित हो। यह तो डिजिटल डिवाइस से मुकाबले का शुरुआती टूल है।

आकाश हार्डवेयर के क्षेत्र में भारत की एक सफल पहल की भी मिसाल है, जहां पारंपरिक रूप से हम फिसड्डी रहे हैं। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र की महाशक्ति के लिए कंप्यूटर हार्डवेयर एक अविजित चुनौती जैसा है, जहां सिम्प्यूटर जैसी एकाध नाकाम परियोजनाओं तथा विप्रो व एचसीएल जैसी सीमित स्तर पर पारंपरिक कंप्यूटर हार्डवेयर का उत्पादन करने वाली कंपनियों के सिवा हमारे पास दिखाने को ज्यादा कुछ नहीं है। हां, इधर कुछ वषों से चिप उत्पादन में जरूर हम थोड़े आगे बढ़े हैं। जापान और अमेरिका के अलावा चीन और ताइवान इस क्षेत्र की नई शक्तियां हैं। हार्डवेयर की पूरी तरह उपेक्षा करके कोई देश वैश्विक तकनीकी शक्ति बनने की सोच भी नहीं सकता।

टैबलेट्स का सच
आकाश के प्रति दूसरी टैबलेट निर्माता कंपनियों के हमले समझ में आते हैं। आई-पैड आज भी तीस हजार से ऊपर का बिकता है और सबसे सस्ते टैबलेट भी (जैसे रिलायंस का टैबलेट लगभग 13 हजार में) दस हजार की सीमा पार नहीं कर पाए हैं। बेहद चर्चित ‘वन टैबलेट पर चाइल्ड’ परियोजना करोड़ों डॉलर के निवेश के बावजूद सौ डॉलर से कम कीमत में कंप्यूटर पेश करने के लिए संघर्ष ही कर रही है। टाटा की नैनो कार के साथ भी ऐसा ही हुआ था।

हमारे बीच में से उठ कर अगर कोई विश्वव्यापी स्तर पर दबदबा बनाता है तो उसकी अहमियत को स्वीकार करने, रचनात्मक आलोचना से उसे और बेहतर बनाने में सहयोग देने और प्रोत्साहित करने की जरूरत है। अब रिलायंस और बीएसएनएल सस्ते टैबलेट लाने वाले हैं। बहुत संभव है कि ये आकाश से बेहतर हों। अगर वे सफल होंगे तो इस सफलता में खुद आकाश का योगदान कम नहीं होगा, जिसने कम बजट में रहते हुए तकनीकी चुनौतियों का समाधान भी खोजा।

निस्संदेह आकाश की बहुत-सी सीमाएं भी हैं। खासकर पहले संस्करण की, जो 5 अक्तूबर 2011 को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा जारी किया गया था। उम्मीद है कि अप्रैल 2012 में आने वाले उसके उन्नत संस्करण में इन कमियों को दूर कर लिया जाएगा। आज जबकि स्मार्टफोन में एक-डेढ़ गीगाहट्र्ज के माइक्रोप्रोसेसर आने लगे हैं, आकाश का 366 मेगाहट्र्ज का प्रोसेसर बहुत कमजोर पड़ जाता है। कंप्यूटिंग का सारा बोझ इसी पर आता है और उसके सामने न सिर्फ शैक्षिक सॉफ्टवेयरों, वर्ड प्रोसेसिंग टूल्स और संचार सुविधाओं को संभालने की चुनौती है, बल्कि खुद टैबलेट के ऑपरेटिंग सिस्टम को चलाने का भी जिम्मा है।

हालांकि वह काम तो चला देता है, लेकिन गति बहुत धीमी है। इसी वजह से आकाश की मजबूरी हो जाता है एंड्रॉयड का पुराना वर्जन (2.2) इस्तेमाल करना, जिसमें बहुत-सी जरूरी सुविधाएं, जैसे अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं के लिए समर्थन, मौजूद नहीं है।

आकाश के साथ आने वाला दो जीबी एक्सटर्नल स्टोरेज आज की परिस्थितियों के लिहाज से बहुत कम है, जब कंप्यूटरों पर एक टेराबाइट (1024 जीबी) की हार्ड डिस्क आने लगी है। हालांकि कहने को तो ब्लैकबेरी के साथ भी महज 512 एमबी का एक्सटर्नल स्टोरेज आया था, लेकिन लोग अपने महंगे फोनों के लिए अतिरिक्त एक्सटर्नल स्टोरेज खरीदने को कुछ असामान्य नहीं समझते। हां, आकाश के लिए एक्सटर्नल स्टोरेज खरीदना बड़ी बात हो जाता है। आप चाहें तो बाजार से माइक्रो एसडी कार्ड खरीद कर इसे 32 जीबी तक बढ़ा सकते हैं।

इस टैबलेट की बैटरी भी दूसरों की तुलना में बहुत जल्दी खर्च होती है। कुछ लोगों को इसमें हाई-डेफिनेशन डिस्प्ले न होने पर आपत्ति है, लेकिन जिनके पास यह टैबलेट जाना है, उन्हें इसमें कोई आकर्षक फिल्में, एनिमेशन और विजुअल इफेक्ट्स नहीं देखने। उन्हें इसका इस्तेमाल ई-बुक्स, टय़ूटोरियल्स देखने, ईमेल पाने-भेजने और वर्ड प्रोसेसिंग के लिए करना है। वे सोलह लाख रंगों की बजाए उनसे कुछ कम में भी काम चला सकते हैं, बशर्ते इससे टैबलेट की कीमत सस्ती बनी रहे।

जो एक कमी अखरती है, वह है इसकी रेजिस्टिव टचस्क्रीन, जिसमें कोई बटन दबाने और उंगलियों से ड्रैग करते हुए कमांड देने के लिए बहुत जोर लगाना पड़ता है। कई बार कमांड दर्ज न होने पर आपको ऐसा दोबारा करना पड़ सकता है। यूजर के साथ इंटरएक्शन चूंकि किसी भी डिवाइस की बुनियादी जरूरत है, इसलिए आकाश में कैपेसिटिव टच स्क्रीन तकनीक का होना जरूरी है। आई-पैड में यही इस्तेमाल होती है और इसमें स्क्रीन पर ज्यादा जोर लगाने की जरूरत नहीं है, टैबलेट उंगलियों के हल्के से मूवमेंट को भी पहचान लेता है। यूजर एक्सपीरियंस बहुत बेहतर हो जाता है।

टैबलेट की नेविगेशन प्रणाली में भी सुधार की जरूरत है। स्क्रीन पर दिखने वाले कुछ बटनों का आकार बदलना, आगे-पीछे जाने की सुविधा, ऑनलाइन कीबोर्ड को ज्यादा सुविधाजनक बनाना जरूरी है। कुछ बटन आपकी उंगली के आकार के दसवें हिस्से जितने छोटे हैं। इन पर उंगलियों से कमांड देना बेहद मुश्किल है। टैबलेट का जल्दी गर्म होना और ब्लू-टूथ समर्थन न होना भी अखरता है।

आकाश को लेकर हाइप तो बहुत बनी है, लेकिन क्या जमीनी स्तर पर इसके बारे में जागरुकता बढ़ाने का प्रयास किया गया है? स्कूल-कॉलेजों, गांव-कस्बों और आम लोगों के बीच आकाश के प्रदर्शन होते, सवाल-जवाब के सत्र होते, बहस के कार्यक्रम होते, छात्रों को प्रायोगिक इस्तेमाल के लिए आमंत्रित किया जाता, इंडस्ट्री से सुझाव और सहयोग मांगा जाता, मीडिया को साथ लेकर बुनियादी अवधारणाओं को स्पष्ट किया जाता तो शायद एक जेनुइन उत्पाद नाइंसाफी का शिकार नहीं होता।

डेटाविंड की उत्पादन संबंधी सीमाएं भी उलझन में डालने वाली हैं, जो मांग को पूरा करने की स्थिति में ही नहीं हैं। आई-पैड जैसे दूसरे व्यावसायिक उत्पादों को लांच करने से पहले कंपनियां पर्याप्त तैयारी करती हैं और सुनिश्चित करती हैं कि लोगों को लंबा इंतजार न करना पड़े। यहां वैसी संभावनाओं पर पहले से ध्यान नहीं दिया गया।

टैबलेट के मूल्यों को लेकर भ्रम की स्थिति है। ऊपर से सरकारी सब्सिडी, मुद्राओं का रूपांतरण और मीडिया में आने वाली अलग-अलग किस्म की खबरें स्थिति को और उलझा देती हैं। आकाश के उन्नत संस्करण के विकास में शामिल कंपनियों को लेकर भी यही हाल है। एक और खबर है कि अब यह परियोजना पूरी तरह भारतीय कंपनियों (सीडैक, आईटीआई, बीईएल आदि) द्वारा संभाली जाएगी तो दूसरी तरफ डेटाविंड का दावा है कि वह प्रोजेक्ट से अलग नहीं हुई है। मानव संसाधन विकास मंत्रलय कम से कम एक आधिकारिक वेबसाइट तो बनवा ही सकता था, जहां लोगों को इससे जुड़ी प्रामाणिक जानकारियां मिल जातीं।

आकाश 1 की कमियां
कमजोर प्रोसेसर (366 मेगाहट्र्ज)
कम रैम (256 एमबी)
कम स्टोरेज (2 जीबी)
पुराना एंड्रॉयड 2.2 ऑपरेटिंग सिस्टम
रेजिस्टिव टचस्क्रीन (कमांड्स देना आसान नहीं)
कम बैटरी लाइफ
जल्दी गर्म होने की समस्या
ब्लूटूथ सपोर्ट नहीं
एंड्रॉयड मार्केटप्लेस से एप्लीकेशन डाउनलोड संभव नहीं
भारतीय भाषाओं के लिए समर्थन नहीं
धीमी रफ्तार

आकाश 1 की खूबियां
सस्ती कीमत
हल्का वजन
सुविधाजनक, दिखने में अच्छा बड़ा
ओपन सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम
यूएसबी ड्राइव सुविधा

आकाश 2 में क्या होगा
बेहतर प्रोसेसर (कम से कम दोगुनी क्षमता)
बेहतर रैम (कम से कम दोगुनी)
ज्यादा स्टोरेज
उन्नत एंड्रॉयड 2.3 ऑपरेटिंग सिस्टम
कैपेसिटिव टचस्क्रीन (कमांड्स आसान)
बेहतर बैटरी लाइफ
एंड्रॉयड मार्केटप्लेस से कनेक्टिविटी
बेहतर रफ्तार

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