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देशहित के लिए गरोबों का ध्यान रखना होगा

विकास की अंधी दौड़ और ग्लोबलाइजेशन के शोर में भूखे बच्चों के आंसू गुम होते जा रहे हैं। गरीबों की थाली सूनी और छोटी होती जा रही है, मगर हमारी सरकार और आर्थिक विश्लेषक जीडीपी और इनफ्लेशन की शोर मचा रहे हैं। मूल्यों में यहां तक ह्रास हो गया है कि हमारे भगवान भी चाइनीज हो गए हैं। सीमा पर ही नहीं बाजारों में उनकी मजबूत घुसपैठ हो गई है और हम इसे इकोनोमी रिफार्म और ग्लोबलाइजेशन बता रहे हैं। इसमें व्यापक बदलाव की जरूरत है।

शनिवार को मेरठ मैनेजमेंट के 25 वें कन्वेंशन के अवसर पर आईआईए हॉल में इनक्लूसिव ग्रोथ-विजन इंडिया 2012 पर आयोजित वर्कशॉप में देश के कई जाने-माने आर्थिक विश्लेषक, उद्यमी और बड़ी कंपनियों के सीईओ ने देश की वर्तमान  अर्थ-व्यवस्था पर गंभीर चिंता जताई। उनलोगों ने कहा  हमारे देश के विकास की योजनाएं पूरी तरह से एकांगी है। इससे त्वरित विकास तो संभव है मगर स्थाई विकास विकास नहीं हो सकता है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष हाई कोर्ट के जज विक्रम नाथ ने कहा कि मूल्यों की शर्त पर होने वाला विकास स्थाई नहीं होता है। इससे विकास के साथ ही करप्शन भी जन्म लेते रहता है। भारत की संस्कृति और सभ्यता को विकास के लिए आधार के रूप में इस्तेमाल करने की जरूरत है। बीएचयू के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के पूर्व विभागध्यक्ष और आर्थिक विकास और मानवीय मूल्य पर काम कर रहे डॉ. एएन त्रिपाठी ने कहा कि डर है कि हमारा विकास सांप और सीढ़ी के खेल के जैसा न हो जाए। मानव को बस केवल कंज्यूमर की नजर से देखा जा रहा है। इस सोच के साथ हम विकास की योजनाएं तैयार कर रहे हैं। मां के दूध की जगह डब्बे वाले दूध को प्रमोट किया जा रहा है। कुछ वर्षो के लिए यह दूध का बाजार जीडीपी तो बढ़ा देगा मगर बाद में उस बच्चाे का क्या होगा। उसका कंधा कि तक ऐसे विकास को ढ़ो पाएगा। उन्होंने कहा कि बनारस के गांवों में प्रधान मंत्री और हमारे वित्त मंत्री जब भाषण देते हैं तो जीडीपी की चर्चा करते हैं। मगर उस भाषण को सुनने वालों को रोटी तक नसीब नहीं होती है। विजन 2020 में व्यापक परिवर्तन करने की जरूरत है वरना इसका हश्र भी पहले की योजनाओं के जैसा ही होगा। उन्होंने मानवीय मूल्यों पर बल देते हुए कहा कि संस्कार की शर्त पर होने वाला विकास स्थाई नहीं है। इसी का परिणाम है कि जिस देश में करोड़ों लोग भूखे सोते हैं वहां के मंत्री लाखों करोड़ रुपये पचाने में सफल हो जाते हैं।

हिन्दुस्तान टाईम्स के एक्यक्यूटिव एडिटर (बिजनेस) गौतम चिकरमने ने कहा कि आर्थिक नीति तैयार करते वक्त पूरे देश की तस्वीर जब तक सामने नहीं रखी जाएगी तबतक सर्वागीन विकास संभव नहीं है। शहर में खड़ी हो रही इमारतें विकास का पैमाना नहीं हो सकती है। उन्होंनें विकास के पांच बड़े दुश्मनों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कहा कि मूल्य वृद्धि, कैपिटेलिज्म और डेमोक्रेसी में बढ़ता फासला, सरकार की प्रो पीपुल की जगह प्रो बिजनेस पॉलिसी, ब्याज दर में लगातार वृद्धि, और करप्शन एण्ड गवर्नेस देश की अर्थ व्यवस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि जहां चंद वर्षो में सोना और तेल से लेकर रोटी-दाल की कीमत दोगुनी हो जाती  हो वहां जीडीपी तो बढ़ सकता है मगर गरीबों को राहत नहीं मिल सकती है। कांटिनेंटल इंडिया लि. के सीईओ एंड्रीज पेंकर्ट ने कहा कि भारत के बाजार में व्यापक संभावनाएं हैं। निवेश के मामलों में विश्व की नजर भारत पर है। इसका फायदा भी हो रहा है। बीएचएयू की प्राचीन भारत,सभ्यता और पुरातत्व विभाग की हेड डॉ. विभा त्रिपाठी ने कहा कि मूल्यों और संस्कृति की शर्त पर होने वाले विकास कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता है। फिलहाल हमारे पास पैसा तो आ रहा है मगर मूल्यों में भारी गिरावट्र आ रही है। 

एमएमए की प्रसीडेंट डॉ. पूनम देवदत्त, चेयरमैन राजीव जैन सहित कइ लोगों ने कार्यक्रम को संबोधित किया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में इसी विषय पर समूह चर्चा की गई जिसमें दर्शकों ने जमकर हिस्सेदारी की। धन्यवाद ज्ञापन त्रिलोक एन आनंद ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से की गई।

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