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जन राजनीति के सिलसिले को बढ़ाएं

अगर आप उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के रहने वाले हैं, तो कृपया ये सवाल अपने आप से पूछिए- चुनाव के दौरान आपने राजनीति की या नहीं? वोट डाला या नहीं? अगर मतदान करने गए, तो बिना भावना में बहे सही उम्मीदवार को मत दिया या नहीं? यदि आपने पोलिंग बूथ की चौखट नहीं लांघी या फिर किसी भावना में बह गए, तो मान लीजिए, आप लोकतंत्र के महायज्ञ में आहुति डालने से खुद को वंचित कर बैठे हैं। इन दो प्रदेशों के लोगों ने पहली बार जोरदार तरीके से लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया है। यह चुनाव किसी नेता की जीत-हार से नहीं, बल्कि जनता जनार्दन की जीत की वजह से जाना जाएगा।

पिछली रायशुमारी के दौरान कोई सोच भी नहीं सकता था कि लोग इतनी बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए उमड़ पड़ेंगे। उत्तराखंड में कुल जमा 67.22 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। 2007 के चुनाव में यह आंकड़ा 63.72 प्रतिशत पर पहुंचकर रुक गया था। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उत्तर प्रदेश में अंतिम आंकड़े आने बाकी हैं, पर तस्वीर का रुख साफ है। अब तक हुए छह चरणों में औसतन 58.47 फीसदी लोगों ने वोट डाला। सातवें और अंतिम चरण की वोटिंग जारी है। उम्मीद है, वोटर की ‘राजनीति’ इस बार भी जीतेगी। आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी निश्चित लहर के अभाव में भी लोग मतदान केंद्रों की ओर उमड़ पड़े। यह लोकतंत्र के लिए बेहद सुकून भरा संदेश है।

दरअसल, जब लहर चल रही होती है, तो लोगों की भावनाएं खुद-ब-खुद सातवें आसमान पर होती हैं। किसी मुद्दे, व्यक्ति, दल के पक्ष या विपक्ष में लोग वोट देने के लिए विकल रहते हैं। इस बार ऐसा कुछ भी नहीं था। उत्तर प्रदेश में तो बहुत-सी सीटों पर चार दलों में मुकाबला था। इसके बावजूद वोटर किसी संशय में पड़े बिना अपने मताधिकार का प्रयोग करते नजर आए। जाहिर है, बासी चेहरों और उकताहट भरे मुद्दों से ऊबे हुए लोग मौजूदा निजाम को नए कलेवर में देखना चाहते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्रामीण इलाकों की वो महिलाएं हैं, जो सिर पर पल्ला डाल या बुरका ओढ़कर बड़ी संख्या में वोट डालने जा पहुंचीं। तय है। यह 21वीं सदी की वो हिन्दुस्तानी औरतें हैं, जो सियासत में भागीदारी चाहती हैं। वे सजग, सतर्क और सक्षम हैं।

मतदान केंद्रों पर भारी भीड़ की एक वजह यह भी थी कि ‘कार्यशील’ लोगों की संख्या में जमकर इजाफा हुआ है। ‘कार्यशील’? आशय उन लोगों से है, जो अपने-अपने क्षेत्रों में प्रतिदिन अपेक्षा के अनुरूप उत्पादक साबित होते हैं। मेरे लिहाज से 18 से 50 साल तक के लोगों को आसानी से कार्यशील के दायरे में रखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या नौ करोड़, 51 लाख से ऊपर है। ये वे लोग हैं, जो सच्चे अर्थों में देश को चलाते हैं। परंतु इन्हें कुछ नौकरशाह अथवा राजनेता हांकते रहे हैं। यही पीड़ा उन्हें मतदान केंद्रों तक खींच लाई।

एक सर्वे के मुताबिक, नौजवान लोगों की राजनीति में रुचि बढ़ी है। 1996 में कुल के 37 फीसदी नौजवान सियासत में रुचि रखते थे। 2012 में यह संख्या बढ़कर 60 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है। नौजवानों में पनपते इस ट्रेंड पर हम खुश हो सकते हैं कि संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र परिपक्वता हासिल कर रहा है। औरतों के साथ नौजवान अब अगली कतारों पर कब्जा जमाते नजर आ रहे हैं।

कुछ और भी मुद्दे हैं, जिनकी वजह से ये चुनाव लंबे समय तक याद किए जाएंगे। केंद्र और कई सूबों में सत्तारूढ़ देश की सबसे बड़ी पार्टी और गांधी परिवार की विरासत संभालने वाले राहुल इस चुनाव में पार्टी के नियामक की भूमिका में नजर आए। आप कोई भी पोस्टर, बैनर या प्रचार सामग्री उठाकर देख लीजिए, हर जगह उन्हें प्रमुखता से दर्शाया गया। पिछले चुनाव में ऐसा नहीं था। राहुल ने भी पार्टी और परिवार के इस भरोसे की लाज रखी। वह पहले के मुकाबले ज्यादा सियासी नजर आए। अब तक उन्हें लोग पश्चिम में पले-बढ़े एक शर्मीले ‘युवराज’ के तौर पर देखते रहे हैं। मौजूदा चुनावों ने उनकी इस छवि को बदल दिया है।

14 नवंबर से 29 फरवरी के बीच में राहुल ने करीब 200 घंटे हवा में बिताए और इससे भी ज्यादा सभाओं को संबोधित किया। लोगों ने महसूस किया कि उनके अंदर जमीनी मुद्दों को समझने की क्षमता तेजी से विकसित हुई है। इसलिए एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों पर उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर बात की और अपना असर छोड़ने में कामयाब रहे। इसी तरह उत्तर प्रदेश के लोगों ने पहली बार समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी को भी केंद्रीय भूमिका में देखा। हालांकि, इन दोनों युवा नेताओं को अभी पिता का संरक्षण हासिल है, पर नीति निर्धारण के मामले में उनका प्रभाव साफ दिखाई पड़ा। दोनों ने ही अपनी भाषण शैली और व्यक्तित्व को अपने वोटर के हिसाब से ढालने की कोशिश की।

अखिलेश खास तौर पर असरदार साबित हुए। ‘धरती पुत्र’ की आकांक्षाओं को नया आयाम देने की उनकी कुव्वत अब सबके सामने है। अखिलेश ने मुलायम सिंह के नक्शे- कदम पर चलते हुए जी-तोड़ मेहनत की। उनकी सभाओं में भी जमकर भीड़ उमड़ी और लोगों ने महसूस किया कि इस नौजवान को कायदे से अपनी बात रखनी आती है। सपा के कई लोग उनमें भावी मुख्यमंत्री देख रहे हैं।

तय है। परिवर्तन की शुरुआत कई स्तरों पर हो चुकी है। राजनीति के प्रति युवाओं और महिलाओं का बदलता हुआ नजरिया जहां सुखद अहसास है, वहीं नेताओं और पार्टियों को भी इस बार चाल और चेहरा बदलने पर मजबूर होना पड़ा। मसलन, उत्तर प्रदेश के किसानों से कट गई कांग्रेस जहां इस बार खुद को उनसे जोड़ती नजर आई, वहीं कंप्यूटर का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी छात्रों को लैपटॉप देने की वकालत करती देखी गई। एक बात और। सभी नेताओं को सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ी और अब मतदान के प्रतिशत ने तो उन्हें चकरा ही दिया है। कोई भी पार्टी समझ नहीं पा रही है कि उसे कितनी सीटें मिलेंगी? आंकड़ों के बाजीगर चुप हैं और चुनावी माहौल में मेंढकों की तरह टर्राते हुए निकल पड़ने वाले तर्कशास्त्री बेचैन। उन्हें मौजूं बहाने नहीं हासिल हो रहे हैं। जवाब के लिए हमें आगामी छह मार्च की दोपहर तक इंतजार करना होगा।

यह तो थी राजनीति की बात, पर कुछ सबक हमारे-आपके लिए। भूलिए मत। यह अब तक का सबसे महंगा चुनाव है। अंदाजन इस पर चार सौ करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होंगे। इतनी बड़ी राशि जनता की जेब से जाती है। हमें इसका हिसाब-किताब जांचने के लिए अगले चुनाव तक का इंतजार करने की बजाय अभी से राजनेताओं पर वायदे पूरे करने का दबाव बनाना चाहिए। एक जिम्मेदार अखबार होने के नाते ‘हिन्दुस्तान’ ने आपसे अपील की थी कि ‘राजनीति’ करें और वोट जरूर डालें। आपने प्रदेश हित में हमारा मान रखा, बहुत-बहुत शुक्रिया। पर यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को ‘उत्तम’ बनाने के लिए हमें साझा कोशिशें करनी होंगी, तभी ‘जन राजनीति’ का यह यज्ञ अपने मकसद तक पहुंच सकेगा। ये चुनाव तो एक शुरुआत भर हैं।

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