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जितना सोचा था उससे ज्यादा पाया

इस बार गलती नहीं हुई। 2008 में आठ बार की ओलंपिक विजेता भारतीय टीम का बीजिंग ओलंपिक खेलने का सपना टूट गया था। लेकिन चार साल बाद इसी टीम ने ओलंपिक क्वालीफायर में 44 गोल किए और लंदन ओलंपिक में जाने के दरवाजे खोले। दरअसल, यह सब संभव हो पाया पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ संदीप सिंह की बदौलत, जिन्होंने टूर्नामेंट में 16 गोल किए, उसमें भी तीन हैट-ट्रिक। कभी वह टीम के डिफेंडर थे, आज अटैकिंग पोजीशन पर हैं। जीत के बाद उनसे बातचीत की रुद्रनील सेन गुप्ता ने। बातचीत के अंश:

ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने पर राहत महसूस कर रहे होंगे?
हमें पूरा भरोसा था कि टीम ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करेगी। अब यह मुमकिन हो गया है। इसलिए हम लोग ओलंपिक में फिर से जलवा दिखाने को लेकर काफी उत्साहित हैं। 2004 ओलंपिक टीम का मैं हिस्सा था, पर इसके बाद काफी लंबा इंतजार करना पड़ा है। जाहिर है, मेरे लिए यह सब कुछ उबाऊ और निराशाजनक रहा। खैर, एक टीम के तौर पर इस क्वालीफायर टूर्नामेंट में वाकई हम अच्छा खेले। मुङो नहीं लगता कि गुजरे चार-पांच वर्षों में हमलोगों ने मैदान पर कभी इतना आत्मविश्वास दिखाया और इतनी आजादी से अपने स्ट्रोक लगाए।

मैंने टूर्नामेंट से पहले ही अपने लिए एक लक्ष्य बनाया था कि मैं 12 गोल करूंगा। आम तौर पर आप खुश होते हैं, जब आप अपने लक्ष्य के करीब पहुंच जाते हैं। लेकिन इस बार मैंने अपने लक्ष्य को भेद दिया। यही नहीं, जितना सोचा था, उससे ज्यादा गोल किए। और हम ओलंपिक के लिए क्वालीफाई भी कर गए। आप इससे ज्यादा की मांग नहीं कर सकते हैं। टीम का मनोबल काफी ऊंचा हुआ है। सभी खिलाड़ी काफी ऊर्जावान महसूस कर रहे हैं। हम इसलिए भी खुश हैं कि अतीत के दाग को मिटाने में कामयाब हुए। अब जरूरत इस बात की है कि हम जल्द से जल्द अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित करें।

कोच नॉब्स के निर्देशन में खेलना आपको क्यों पसंद है?
माइकल नॉब्स एक अच्छे कोच हैं। वह खेल-तकनीकी व कूटनीति, दोनों को बेहतर तरीके से समझते हैं। इसके अलावा, उनकी खासियत है कि वह हमेशा खिलाड़ियों के साथ ईमानदारी बरतते हैं। चाहे प्रशंसा हो या आलोचना, सब कुछ साफ-साफ कहते हैं। लेकिन मैदान पर उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह खेल पर सारा ध्यान लगाते हैं और खिलाड़ियों के साथ कड़ी मेहनत करते हैं। मैदान से बाहर भी वह उपलब्ध होते हैं और सबसे बेहतर संबंध रखते हैं। खिलाड़ियों के साथ उनका व्यवहार ऐसा होता है, मानो वह उनके दोस्त हों।

टूर्नामेंट से पहले नॉब्स वरिष्ठ खिलाड़ियों को हटाने और टीम के साथ नए-नए प्रयोगों को लेकर मुश्किल में थे?
देखिए, नॉब्स ने अकेले कोई फैसला नहीं लिया। और भी लोग थे, जिन्होंने मिलकर फैसले किए। टीम के एक्सरसाइज फिजियोलॉजिस्ट डेविड जॉन, नॉब्स और खिलाड़ी, सभी मिलकर फिटनेस, फॉर्म, खिलाड़ियों की भूमिका और कौन-कौन-सी कमियों को सुधारने की जरूरत है, इन सभी मसलों पर चर्चा करते थे। उदाहरण के लिए, वे मुझसे पूछते थे कि क्या तुम फॉरवर्ड में खेलने जाओगे, तो  मैं कहता था कि ठीक है। इसलिए उन लोगों ने मुझे पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में अटैकिंग पोजिशन पर खड़ा किया था। कोच चाहते हैं कि तमाम विकल्प खुले रहें। उन्हें खिलाड़ियों को चुनौती देना भी पसंद है। वह ऐसा सोचते थे कि मुझमें फॉरवर्ड में खेलने की क्षमता है। इसलिए उन्होंने मुझ पर मेहनत की। मेरे आक्रमण के तकनीकी पक्ष को सुधारा। यहां तक कि उन्होंने मेरी गति को भी बढ़ाने में मदद की। उन्होंने इस टूर्नामेंट में मुङो कुछ मैचों में आक्रमण के लिए भेजा था। मेरे लिए वे पल बड़े अच्छे रहे। मैं टीम में डिफेंडर बना रहूंगा, पर कोच विपक्षी खेमे को हैरत में डालने के लिए मुझे अटैकिंग पोजिशन पर भेजते रहेंगे।

नॉब्स ने टूर्नामेंट से पहले कहा था कि भारत का आक्रमण अच्छा है, पर बचाव अब भी कमजोर है। कुछ सुधार हुआ?
हां, सुधार हुआ है। अगर आप फाइनल मुकाबले को देखें, तो पाएंगे कि टीम ने बस एक गोल ही खाया। यहां तक कि पूरे टूर्नामेंट में भी हमारे ऊपर कम ही गोल हुए। लेकिन अब भी कुछ खामियां हैं। कुछ ऐसे मसले हैं, जिनके हल ढूंढ़ने होंगे। इसलिए हम लोग इन पर काम कर रहे हैं। अभी तो मैं यह नहीं बता सकता हूं कि वे मुद्दे कौन-से हैं, क्योंकि वे बस टीम के जानने लायक ही हैं।

पिछले कुछ वर्षों की तुलना में टीम मैदान पर ज्यादा तेज हुई है?
जी हां, हमने काफी रफ्तार पकड़ी है। आप एक बार फिर फाइनल को याद कीजिए। आप पाएंगे कि हम लोग शुरू से ही काफी तेजी से हमले कर रहे थे और यह अंत तक चलता रहा। मैदान पर खिलाड़ियों का धैर्य काफी बढ़ा है। अब हम लोग काफी मजबूत पॉवर ट्रेनिंग कर रहे हैं। यह वजन रहित ट्रेनिंग है और इससे हमारी शक्ति और सहनशीलता, दोनों ही तेजी से बढ़ रही है।

फाइनल में आपने टूर्नामेंट में अपना तीसरा हैट-ट्रिक लगाया। दूसरे खिलाड़ियों की अपेक्षा आपने ज्यादा जश्न मनाया होगा?
तीन हैट-ट्रिक बनाना वाकई बड़ी खुशी की बात है। ये तीनों हैट-ट्रिक फ्रांस, इटली और फिर फ्रांस के खिलाफ बने, जिन्हें अच्छी टीमों में शामिल किया जाता है। मेरे पास हैट-ट्रिक बनाने के और भी मौके थे। पर पोलैंड और कनाडा के खिलाफ मैं चूक गया। लेकिन यह किस्मत है। मुङो नहीं मालूम कि मैंने दूसरे खिलाड़ियों से ज्यादा इस जीत का जश्न मनाया है, पर हममें से कोई भी इस जीत के 24 घंटे बाद तक नहीं सो पाया। फाइनल के बाद हम लौटे और तब से जश्न का दौर शुरू हो गया। और यह सुबह छह-सात बजे तक चलता रहा। आपसे बातचीत के दौरान भी मैं लगातार इस मशक्कत में जुटा हूं कि कहीं नींद के मारे इसी कुरसी पर न सो जाऊं।

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